ज्योतिर्लेखावलयि गलितं यस्य बर्हं भवानी
पुत्रप्रीत्या कुवलयपदप्रापि कर्णे करोति ।
धौतापाङ्गं हरशशिरुचा पावकेस्तं मयूरं
पश्चादद्रिग्रहणगुरुभिर्गर्जितैर्नर्तयेथाः ॥
ज्योतिर्लेखावलयि गलितं यस्य बर्हं भवानी
पुत्रप्रीत्या कुवलयपदप्रापि कर्णे करोति ।
धौतापाङ्गं हरशशिरुचा पावकेस्तं मयूरं
पश्चादद्रिग्रहणगुरुभिर्गर्जितैर्नर्तयेथाः ॥
पुत्रप्रीत्या कुवलयपदप्रापि कर्णे करोति ।
धौतापाङ्गं हरशशिरुचा पावकेस्तं मयूरं
पश्चादद्रिग्रहणगुरुभिर्गर्जितैर्नर्तयेथाः ॥
अन्वयः
AI
भवानी पुत्र-प्रीत्या यस्य ज्योतिः-लेखा-वलयि गलितं बर्हं कुवलय-पद-प्रापि कर्णे करोति, पावकेः तं धौत-अपाङ्गं हर-शशि-रुचा मयूरं पश्चात् अद्रि-ग्रहण-गुरुभिः गर्जितैः नर्तयेथाः।
Summary
AI
You should cause the peacock of Kārttikeya to dance with your thundering echoes amplified by the mountains. This peacock, whose outer eye-corners are brightened by the light of Śiva’s crescent moon, has shed a plume circled with light which Pārvatī places on her ear like a blue lotus out of motherly affection.
सारांश
AI
कार्तिकेय के उस मयूर को अपने गर्जन से नचाना, जिसके गिरे हुए चमकदार पंखों को पार्वती पुत्र-प्रेम के कारण कानों में धारण करती हैं। शिव के मस्तक के चंद्रमा की चांदनी से उस मयूर की आँखों के कोर उज्वल हो गए हैं।
वल्लभदेवः
पश्चादनन्तरं पावकेः स्कन्दस्य तं वाहनं मयूरं गर्जितैर्नर्तयेथा लास्यं कारयेथाः । जलदरवनिशमनाद्धि बर्हिणो नृत्यन्ति । तमित्युक्तम् । कं तमित्याह । यस्य गलितं भ्रष्टं बर्हं पक्षं गौरी पुत्रप्रीत्या कर्णे करोत्यवतंसीकुरुते । तच्च कुवलयपदप्राप्युत्पलस्थानारूढम् । ज्योतिर्लेखावलयं तेजोराजिमण्डलं विद्यते यस्य तत्तथोक्तम् । हरशशिरुचा शिवशिरश्चन्द्रश्चन्द्रिकया धौतापाङ्गं क्षालितनेत्रान्तम् । गर्जितैः कीदृशैः । अद्रिग्रहणगुरुभिः पर्वतप्राप्तिपीवरैः । अद्रिग्रहणशब्दे न कर्तृपष्ठीसमासः । नर्तयेथा इति न पादमीत्यादिनात्मनेपदम् ॥
पदच्छेदः
AI
| ज्योतिर्लेखावलयि | ज्योतिस्–लेखा–वलयिन् (२.१) | encircled by a line of light |
| गलितम् | गलित (√गल्+क्त, २.१) | fallen |
| यस्य | यद् (६.१) | whose |
| बर्हम् | बर्ह (२.१) | feather |
| भवानी | भवानी (१.१) | Bhavani (Parvati) |
| पुत्रप्रीत्या | पुत्र–प्रीति (३.१) | out of love for her son |
| कुवलयपदप्रापि | कुवलय–पद–प्रापिन् (२.१) | which attains the status of a blue lotus |
| कर्णे | कर्ण (७.१) | in the ear |
| करोति | करोति (√कृ कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | places |
| धौतापाङ्गम् | धौत–अपाङ्ग (२.१) | whose outer corners of the eyes are washed |
| हरशशिरुचा | हर–शशिन्–रुच् (३.१) | by the light of Shiva's moon |
| पावकेः | पावकि (२.१) | the son of Agni (Skanda's peacock) |
| तम् | तद् (२.१) | that |
| मयूरम् | मयूर (२.१) | peacock |
| पश्चात् | पश्चात् | afterwards |
| अद्रिग्रहणगुरुभिः | अद्रि–ग्रहण–गुरु (३.३) | heavy with the echo from the mountains |
| गर्जितैः | गर्जित (३.३) | with thunderings |
| नर्तयेथाः | नर्तयेथाः (√नृत् +णिच् कर्तरि विधिलिङ् (आत्मने.) म.पु. एक.) | you should make dance |
छन्दः
मन्दाक्रान्ता [१७: मभनततगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ज्यो | ति | र्ले | खा | व | ल | यि | ग | लि | तं | य | स्य | ब | र्हं | भ | वा | नी |
| पु | त्र | प्री | त्या | कु | व | ल | य | प | द | प्रा | पि | क | र्णे | क | रो | ति |
| धौ | ता | पा | ङ्गं | ह | र | श | शि | रु | चा | पा | व | के | स्तं | म | यू | रं |
| प | श्चा | द | द्रि | ग्र | ह | ण | गु | रु | भि | र्ग | र्जि | तै | र्न | र्त | ये | थाः |
| म | भ | न | त | त | ग | ग | ||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.