तस्य स्थित्वा कथमपि पुरः कौतुकाधानहेतो-
रन्तर्बाष्पश्चिरमनुचरो राजराजस्य दध्यौ ।
मेघालोके भवति सुखिनोऽप्यन्यथावृत्ति चेतः
कण्ठाश्लेषप्रणयिनि जने किं पुनर्दूरसंस्थे ॥
तस्य स्थित्वा कथमपि पुरः कौतुकाधानहेतो-
रन्तर्बाष्पश्चिरमनुचरो राजराजस्य दध्यौ ।
मेघालोके भवति सुखिनोऽप्यन्यथावृत्ति चेतः
कण्ठाश्लेषप्रणयिनि जने किं पुनर्दूरसंस्थे ॥
रन्तर्बाष्पश्चिरमनुचरो राजराजस्य दध्यौ ।
मेघालोके भवति सुखिनोऽप्यन्यथावृत्ति चेतः
कण्ठाश्लेषप्रणयिनि जने किं पुनर्दूरसंस्थे ॥
अन्वयः
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कौतुक-आधान-हेतोः तस्य पुरः कथम् अपि चिरं स्थित्वा राज-राजस्य अनुचरः अन्तर्-बाष्पः (सन्) दध्यौ। मेघ-आलोके सुखिनः अपि चेतः अन्यथा-वृत्ति भवति, कण्ठ-आश्लेष-प्रणयिनि जने दूर-संस्थे (सति) किं पुनः?
Summary
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Standing with great effort before the cloud that stirs longing, the attendant of Kubera remained pensive for a long time while suppressing his tears. Even a happy person’s mind undergoes a change of mood upon seeing a cloud; how much more so when the person one longs to embrace is far away?
सारांश
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कुबेर के उस सेवक यक्ष ने कौतुक जगाने वाले मेघ के सामने जैसे-तैसे खड़े होकर आंसुओं को रोकते हुए देर तक विचार किया। मेघ को देखकर सुखी व्यक्ति का मन भी व्याकुल हो जाता है, फिर जिसका कंठ-आलिंगन चाहने वाला प्रियजन दूर हो, उसकी तो बात ही क्या है।
वल्लभदेवः
तस्य जीमूतस्य पुरोऽग्रतः कथमपि स्थित्वा राजराजस्य वैश्रवणस्यानुचरो भृत्योऽन्तर्बाष्पोऽस्रुकण्ठः किमप्यज्ञायमानं वस्तु चिरं दध्यावचिन्तयत् । कीदृशस्य । कौतुकाधानहेतोः केतकाख्यष्पजननकारणस्य । प्रावृषि तेषामुद्भवात् । अथ जलददर्शनमात्रेण कस्मादस्यान्तर्बाष्पत्वं ध्यानं चेत्याह । सुखिनोऽप्यवियुक्तस्यापि मेघालोके वर्षाकाले चेतोऽन्यथावृक्ति सविपर्ययमनल्पोत्कण्ठासंकुलम् । किं पुनः कण्ठाश्लेषप्रणयिनि प्रियतमाख्ये जने दूरवर्तिनि सति । वर्षासमयमागतमवलोक्य स्वस्था अपि यत्रोत्कण्ठन्ते तत्र विरहिणां का कथेत्यर्थः । कण्ठाश्लेष एव प्रणयोऽर्थिता विद्यते यस्य । मेघा आलोक्यन्ते यस्मिन्निति वर्षाः । स्वरूपात्प्रच्युतावस्थमन्यथावृत्ति ॥
पदच्छेदः
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| तस्य | तद् (६.१) | of it (the cloud) |
| स्थित्वा | स्थित्वा (√स्था+क्त्वा) | having stood |
| कथम् | कथम् | somehow |
| अपि | अपि | even |
| पुरः | पुरस् | before |
| कौतुकाधानहेतोः | कौतुक–आधान–हेतु (६.१) | which was the cause of his intense longing |
| अन्तर्बाष्पः | अन्तर्–बाष्प (१.१) | with tears held within |
| चिरम् | चिरम् | for a long time |
| अनुचरः | अनुचर (१.१) | the attendant |
| राजराजस्य | राजराज (६.१) | of the king of kings (Kubera) |
| दध्यौ | दध्यौ (√ध्यै कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | pondered |
| मेघालोके | मेघ–आलोक (७.१) | at the sight of a cloud |
| भवति | भवति (√भू कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | becomes |
| सुखिनः | सुखिन् (६.१) | of a happy person |
| अपि | अपि | even |
| अन्यथावृत्ति | अन्यथा–वृत्ति (१.१) | of a different disposition |
| चेतः | चेतस् (१.१) | the mind |
| कण्ठाश्लेषप्रणयिनि | कण्ठ–आश्लेष–प्रणयिन् (७.१) | longing for a neck-embrace |
| जने | जन (७.१) | when the person |
| किम् | किम् | what |
| पुनः | पुनर् | then |
| दूरसंस्थे | दूर–संस्थित (७.१) | is far away |
छन्दः
मन्दाक्रान्ता [१७: मभनततगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | स्य | स्थि | त्वा | क | थ | म | पि | पु | रः | कौ | तु | का | धा | न | हे | तो |
| र | न्त | र्बा | ष्प | श्चि | र | म | नु | च | रो | रा | ज | रा | ज | स्य | द | ध्यौ |
| मे | घा | लो | के | भ | व | ति | सु | खि | नो | ऽप्य | न्य | था | वृ | त्ति | चे | तः |
| क | ण्ठा | श्ले | ष | प्र | ण | यि | नि | ज | ने | किं | पु | न | र्दू | र | सं | स्थे |
| म | भ | न | त | त | ग | ग | ||||||||||
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