भर्तुः कण्ठच्छविरिति गणैः सादरं दृश्यमाणः
पुण्यं यायास्त्रिभुवनगुरोर्धाम चण्डेश्वरस्य ।
धूतोद्यानं कुवलयरजोगन्धिभिर्गन्धवत्या-
स्तोयक्रीडानिरतयुवतिस्नानतिक्तैर्मरुद्भिः ॥
भर्तुः कण्ठच्छविरिति गणैः सादरं दृश्यमाणः
पुण्यं यायास्त्रिभुवनगुरोर्धाम चण्डेश्वरस्य ।
धूतोद्यानं कुवलयरजोगन्धिभिर्गन्धवत्या-
स्तोयक्रीडानिरतयुवतिस्नानतिक्तैर्मरुद्भिः ॥
पुण्यं यायास्त्रिभुवनगुरोर्धाम चण्डेश्वरस्य ।
धूतोद्यानं कुवलयरजोगन्धिभिर्गन्धवत्या-
स्तोयक्रीडानिरतयुवतिस्नानतिक्तैर्मरुद्भिः ॥
अन्वयः
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गणैः भर्तुः कण्ठ-छविः इति सादरं दृश्यमानः, गन्धवत्याः कुवलय-रज-गन्धिभिः तोय-क्रीडा-निरत-युवति-स्नान-तिक्तैः मरुद्भिः धूत-उद्यानं त्रिभुवन-गुरोः चण्डेश्वरस्य पुण्यं धाम यायाः।
Summary
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Viewed with reverence by the attendants of Śiva as having the complexion of their master's throat, proceed to the holy temple of Caṇḍeśvara, the lord of the three worlds. Its gardens are shaken by the breezes from the Gandhavatī river, which are scented with lotus pollen and the fragrant unguents of bathing maidens, creating a sacred and pleasant atmosphere.
सारांश
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शिव के गण तुम्हें स्वामी के कण्ठ के समान नील वर्ण वाला समझकर आदर देंगे। तुम महाकाल के धाम जाना, जहाँ गन्धवती नदी की हवाएँ युवतियों के स्नान और कमलों के पराग से सुगन्धित होकर बगीचों को झकझोरती हैं।
वल्लभदेवः
अस्या उज्जयिन्याः सौधेष्वध्वखिन्नानन्तरात्मा निशामतिवाह्य चण्डेश्वरम्य शंभोर्धामायतनं याया गच्छेः । कीदृशः । जालोद्गीर्णैर्गवाक्षविवरनिर्गतैरङ्गनामूर्धजोपस्कारधूमैरुपचितवपुः पीवरतनुः । धूमप्रायत्वादभ्राणाम् । तथा गृहमयूरैः सुहृत्स्नेहाद्दत्तो वितीर्णो नृत्तमेवोपहारो बलिर्यस्य । ते हि त्वामालोक्य सुहृत्स्नेहान्नृत्यन्ति । कीदृशेषु हर्म्येषु । कुसुमैरूपकारपुष्पैः सुगन्धिषु । तथा ललितानां सविलासानां वनितानां पादानामलक्तकेनाङ्कितेषु चिह्नितेषु । त्वं कीदृशः । गणैः प्रीत्यालोक्यमानः । कुतः । भर्तुः शम्भोः कण्ठच्छविर्गलनिभकान्तिरित्यतो हेतोः । कीदृशं धाम । पुण्यं पवित्रम् । तथा गन्धवत्याख्याया नद्या मरुद्भिर्वातैर्धूतोद्यानमुल्लसितोपवनम् । कीदृशैः । कुवलयरजोगन्धिभिरुत्पलरेणुसौरभं विद्यते येषां तैः । तथा तोयक्रीडायां जलकेलौ निरताः सक्ता या युवतयस्तासां स्नानेन तिक्तैः कटुकैः । अङ्गरागसंक्रमणात् ॥
पदच्छेदः
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| भर्तुः | भर्तृ (६.१) | of the Lord (Shiva) |
| कण्ठच्छविः | कण्ठ–छवि (१.१) | the lustre of the neck |
| इति | इति | thus |
| गणैः | गण (३.३) | by the Ganas |
| सादरम् | सादरम् | respectfully |
| दृश्यमाणः | दृश्यमाण (√दृश्+शानच्, १.१) | being looked at |
| पुण्यम् | पुण्य (२.१) | holy |
| यायाः | यायाः (√या कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you should go |
| त्रिभुवनगुरोः | त्रिभुवन–गुरु (६.१) | of the preceptor of the three worlds |
| धाम | धामन् (२.१) | abode |
| चण्डेश्वरस्य | चण्डेश्वर (६.१) | of Chandeshvara (Shiva) |
| धूतोद्यानम् | धूत–उद्यान (२.१) | whose gardens are shaken |
| कुवलयरजोगन्धिभिः | कुवलय–रजस्–गन्धिन् (३.३) | fragrant with the pollen of blue lotuses |
| गन्धवत्याः | गन्धवती (६.१) | of the Gandhavati river |
| तोयक्रीडानिरतयुवतिस्नानतिक्तैः | तोयक्रीडा–निरत–युवति–स्नान–तिक्त (३.३) | made pungent by the bathing of young women engaged in water-sports |
| मरुद्भिः | मरुत् (३.३) | by the breezes |
छन्दः
मन्दाक्रान्ता [१७: मभनततगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| भ | र्तुः | क | ण्ठ | च्छ | वि | रि | ति | ग | णैः | सा | द | रं | दृ | श्य | मा | णः |
| पु | ण्यं | या | या | स्त्रि | भु | व | न | गु | रो | र्धा | म | च | ण्डे | श्व | र | स्य |
| धू | तो | द्या | नं | कु | व | ल | य | र | जो | ग | न्धि | भि | र्ग | न्ध | व | त्या |
| स्तो | य | क्री | डा | नि | र | त | यु | व | ति | स्ना | न | ति | क्तै | र्म | रु | द्भिः |
| म | भ | न | त | त | ग | ग | ||||||||||
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