वक्रः पन्था यदपि भवतः प्रस्थितस्योत्तराशां
सौधोत्सङ्गप्रणयविमुखो मा स्म भूरुज्जयिन्याः ।
विद्युद्दामस्फुरितचकितैस्तत्र पौराङ्गनानां
लोलापाङ्गैर्यदि न रमसे लोचनैर्वञ्चितोऽसि ॥
वक्रः पन्था यदपि भवतः प्रस्थितस्योत्तराशां
सौधोत्सङ्गप्रणयविमुखो मा स्म भूरुज्जयिन्याः ।
विद्युद्दामस्फुरितचकितैस्तत्र पौराङ्गनानां
लोलापाङ्गैर्यदि न रमसे लोचनैर्वञ्चितोऽसि ॥
सौधोत्सङ्गप्रणयविमुखो मा स्म भूरुज्जयिन्याः ।
विद्युद्दामस्फुरितचकितैस्तत्र पौराङ्गनानां
लोलापाङ्गैर्यदि न रमसे लोचनैर्वञ्चितोऽसि ॥
अन्वयः
AI
उत्तराशां प्रस्थितस्य भवतः पन्थाः यद् अपि वक्रः, उज्जयिन्याः सौध-उत्सङ्ग-प्रणय-विमुखः मा स्म भूः। तत्र पौर-अङ्गनानां विद्युत्-दाम-स्फुरित-चकितैः लोल-अपाङ्गैः लोचनैः यदि न रमसे वञ्चितः असि।
Summary
AI
Although your path toward the north is roundabout, do not fail to visit the palace rooftops of Ujjayinī. If you do not enjoy the glances of the city's women—their eyes startled by the flashes of lightning and possessing tremulous corners—then you are surely cheated of life's greatest pleasure, for their beauty is unparalleled.
सारांश
AI
यद्यपि उत्तर की ओर जाते समय तुम्हारा मार्ग टेढ़ा होगा, फिर भी उज्जयिनी के महलों का आनन्द लेने से विमुख न होना। यदि तुमने वहाँ बिजली की चमक से चकित सुन्दरियों के चंचल कटाक्षों का आनन्द नहीं लिया, तो तुम ठगे जाओगे।
वल्लभदेवः
कौबेरीमाशां तव यियासोरुज्जयिनीं प्रति यद्यपि वक्रः पन्थाः कुटिलोऽध्वा तथाप्युज्जयिन्याः सौधोत्सङ्गप्रणयविमुखो हर्म्याङ्कोपभोगवितृष्णो मा भूः । अवश्यं गच्छेरित्यर्थः । यस्मात्तत्र नागरिकाणां नेत्रविभ्रमैर्यदि न रमसे न क्रीडसे तद्वञ्चितोऽसि । द्रष्टव्यादर्शनात् । कीदृशीः । विद्युद्दामस्फुरितचकितैः शम्पागुणविलसनत्रस्तैः । तथा लोलापाङ्गैश्चतुरपर्यन्तैः ॥
पदच्छेदः
AI
| वक्रः | वक्र (१.१) | a detour |
| पन्था | पथिन् (१.१) | path |
| यत् | यद् | although |
| अपि | अपि | |
| भवतः | भवत् (६.१) | your |
| प्रस्थितस्य | प्रस्थित (प्र√स्था+क्त, ६.१) | of you who has set out |
| उत्तराशाम् | उत्तर–आशा (२.१) | towards the northern direction |
| सौधोत्सङ्गप्रणयविमुखः | सौध–उत्सङ्ग–प्रणय–विमुख (१.१) | averse to the love of the palace-tops |
| मा | मा | do not |
| स्म | स्म | |
| भूः | भूः (√भू कर्तरि लुङ् (परस्मै.) म.पु. एक.) | be |
| उज्जयिन्याः | उज्जयिनी (६.१) | of Ujjayini |
| विद्युद्दामस्फुरितचकितैः | विद्युत्–दामन्–स्फुरित–चकित (३.३) | startled by the flashing of your lightning-garland |
| तत्र | तत्र | there |
| पौराङ्गनानाम् | पुर–अङ्गना (६.३) | of the city women |
| लोलापाङ्गैः | लोल–अपाङ्ग (३.३) | with tremulous side-glances |
| यदि | यदि | if |
| न | न | not |
| रमसे | रमसे (√रम् कर्तरि लट् (आत्मने.) म.पु. एक.) | you delight |
| लोचनैः | लोचन (३.३) | with the eyes |
| वञ्चितः | वञ्चित (√वञ्च्+क्त, १.१) | cheated |
| असि | असि (√अस् कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you are |
छन्दः
मन्दाक्रान्ता [१७: मभनततगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| व | क्रः | प | न्था | य | द | पि | भ | व | तः | प्र | स्थि | त | स्यो | त्त | रा | शां |
| सौ | धो | त्स | ङ्ग | प्र | ण | य | वि | मु | खो | मा | स्म | भू | रु | ज्ज | यि | न्याः |
| वि | द्यु | द्दा | म | स्फु | रि | त | च | कि | तै | स्त | त्र | पौ | रा | ङ्ग | ना | नां |
| लो | ला | पा | ङ्गै | र्य | दि | न | र | म | से | लो | च | नै | र्व | ञ्चि | तो | ऽसि |
| म | भ | न | त | त | ग | ग | ||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.