नीचैराख्यं गिरिमधिवसेस्तत्र विश्रामहेतो-
स्त्वत्सम्पर्कात्पुलकितमिव प्रौढपुष्पैः कदम्बैः ।
यः पण्यस्त्रीरतिपरिमलोद्गारिभिर्नागराणा-
मुद्दामानि प्रथयति शिलावेश्मभिर्यौवनानि ॥
नीचैराख्यं गिरिमधिवसेस्तत्र विश्रामहेतो-
स्त्वत्सम्पर्कात्पुलकितमिव प्रौढपुष्पैः कदम्बैः ।
यः पण्यस्त्रीरतिपरिमलोद्गारिभिर्नागराणा-
मुद्दामानि प्रथयति शिलावेश्मभिर्यौवनानि ॥
स्त्वत्सम्पर्कात्पुलकितमिव प्रौढपुष्पैः कदम्बैः ।
यः पण्यस्त्रीरतिपरिमलोद्गारिभिर्नागराणा-
मुद्दामानि प्रथयति शिलावेश्मभिर्यौवनानि ॥
अन्वयः
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तत्र विश्राम-हेतोः नीचैः आख्यं गिरिं अधिवसेः, त्वत्-सम्पर्कात् प्रौढ-पुष्पैः कदम्बैः पुलकितम् इव, यः पण्य-स्त्री-रति-परिमल-उद्गारिभिः शिला-वेश्मभिः नागराणाम् उद्दामानि यौवनानि प्रथयति।
Summary
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Rest for a while on the mountain named Nīcaiḥ, which will seem to thrill with joy through its fully bloomed kadamba flowers upon contact with you. This mountain reveals the unbridled youth of the city's residents through its stone grottoes, which exhale the fragrance of perfumes used by courtesans during their dalliances, serving as a witness to their secret pleasures.
सारांश
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विश्राम के लिए तुम 'नीचैः' पर्वत पर ठहरना, जो तुम्हारे स्पर्श से खिले कदम्बों के कारण रोमांचित सा दिखेगा। वहाँ की गुफाएँ नगरवासियों के विलासी यौवन और गणिकाओं के इत्र की सुगन्ध को प्रकट करती हैं।
वल्लभदेवः
तत्र विदिशायां नीचैराख्यमद्रिं विश्रामार्थं त्वमधिवसेरधितिष्ठेराश्रयेः । कीदृशम् । प्रौढपुष्पैर्विकसितकुमुमैः कदम्बैस्ततरुभिर्हेतुभिस्तव सुखदः संक्षेपात्पुलकितमिव रोमाञ्चितमिव । फुलस्य हि कदम्बकुमुमस्य रोमशोभा जायते । केचित्त्वप्रौढेति पेठुर्मुकुलितत्त्वाच्च पुलकाकारतामाहुः । यश्चाद्रिर्नागराणां विदग्धानामुद्दामानि प्रचण्डानि यौवनानि शिलावेश्मभिः प्रख्यापयति । यतः पण्यस्त्रीरतिपरिमलोद्गारिभिर्गणिकासुरतामोदमोचिभिः । विश्रामशब्दः कवीनां प्रमादजः ॥
पदच्छेदः
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| नीचैराख्यम् | नीचैस्–आख्य (२.१) | named Nichais |
| गिरिम् | गिरि (२.१) | the mountain |
| अधिवसेः | अधिवसेः (अधि√वस् कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you should inhabit |
| तत्र | तत्र | there |
| विश्रामहेतोः | विश्राम–हेतु (५.१) | for the sake of rest |
| त्वत्सम्पर्कात् | त्वत्–सम्पर्क (५.१) | from contact with you |
| पुलकितम् | पुलकित (२.१) | thrilled |
| इव | इव | as if |
| प्रौढपुष्पैः | प्रौढ–पुष्प (३.३) | with fully blossomed flowers |
| कदम्बैः | कदम्ब (३.३) | with Kadamba trees |
| यः | यद् (१.१) | which |
| पण्यस्त्रीरतिपरिमलोद्गारिभिः | पण्यस्त्री–रति–परिमल–उद्गारिन् (३.३) | exhaling the perfumes from the love-making of courtesans |
| नागराणाम् | नागर (६.३) | of the city-dwellers |
| उद्दामानि | उद्दाम (२.३) | unrestrained |
| प्रथयति | प्रथयति (√प्रथ् +णिच् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | proclaims |
| शिलावेश्मभिः | शिला–वेश्मन् (३.३) | by its stone-houses |
| यौवनानि | यौवन (२.३) | youthful passions |
छन्दः
मन्दाक्रान्ता [१७: मभनततगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नी | चै | रा | ख्यं | गि | रि | म | धि | व | से | स्त | त्र | वि | श्रा | म | हे | तो |
| स्त्व | त्स | म्प | र्का | त्पु | ल | कि | त | मि | व | प्रौ | ढ | पु | ष्पैः | क | द | म्बैः |
| यः | प | ण्य | स्त्री | र | ति | प | रि | म | लो | द्गा | रि | भि | र्ना | ग | रा | णा |
| मु | द्दा | मा | नि | प्र | थ | य | ति | शि | ला | वे | श्म | भि | र्यौ | व | ना | नि |
| म | भ | न | त | त | ग | ग | ||||||||||
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