तेषां दिक्षु प्रथितविदिशालक्षणां राजधानीं
गत्वा सद्यः फलमविकलं कामुकत्वस्य लब्धा ।
तीरोपान्तस्तनितसुभगं पास्यसि स्वादु यत्त-
त्सभ्रूभङ्गं मुखमिव पयो वेत्रवत्याश्चलोर्मि ॥
तेषां दिक्षु प्रथितविदिशालक्षणां राजधानीं
गत्वा सद्यः फलमविकलं कामुकत्वस्य लब्धा ।
तीरोपान्तस्तनितसुभगं पास्यसि स्वादु यत्त-
त्सभ्रूभङ्गं मुखमिव पयो वेत्रवत्याश्चलोर्मि ॥
गत्वा सद्यः फलमविकलं कामुकत्वस्य लब्धा ।
तीरोपान्तस्तनितसुभगं पास्यसि स्वादु यत्त-
त्सभ्रूभङ्गं मुखमिव पयो वेत्रवत्याश्चलोर्मि ॥
अन्वयः
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तेषां दिक्षु प्रथित-विदिशा-लक्षणां राजधानीं गत्वा सद्यः कामुकत्वस्य अविकलं फलं लब्धा असि। यत् तीर-उपान्त-स्तनित-सुभगं पयः, स-भ्रू-भङ्गं मुखम् इव वेत्रवत्याः चल-ऊर्मि स्वादु पास्यसि।
Summary
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Upon reaching Vidiśā, the famous capital of the Daśārṇa region, you will immediately gain the full reward of a lover's desire. You will drink the sweet, wavy water of the Vetravatī river, which, with its pleasant thundering against the banks, resembles a beautiful face with playful, trembling eyebrows, satisfying your longing as you merge with her currents.
सारांश
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विदिशा नगरी में पहुँचकर तुम कामुकता का पूर्ण फल प्राप्त करोगे। वहाँ तुम वेत्रवती नदी के उस मीठे जल का पान करोगे, जो चंचल लहरों के कारण भौहें चढ़ाए हुए किसी सुन्दरी के मुख के समान प्रतीत होता है।
वल्लभदेवः
तेषां दशार्णानां विदिशाख्यां राजधानीं गत्वा तत्क्षणमविकलं परिपूर्णं कामुकत्वस्य फलं त्वं लब्धा प्राप्स्यसि । कुत इत्याह । यद्यस्माद्वेत्रवत्याः सरितस्तदेवंविधं पयः पास्यमि । कीदृशम् । तीरोपान्ते स्तनितेन पक्षिकूजितेन स्खलितेन वा सुभगं सुन्दरं स्वादु रुच्यं चलोर्मि स्खलितवीचि । अत एव सभ्रूभेदेन मुखेन तुल्यम् । अत एव कामित्वफललाभः । कामी हि कामिन्याः कुटिलभ्रु वक्त्रं स्वादु धयति । ऊर्मीणां भ्रुव उपमानम् । यदिति हेतुपदम् । तदिति पयोनिर्देशः । विदिशाशब्दः पृषोदरादिः । लक्षणं नाम । लब्धेति तृन्नन्तः ॥
पदच्छेदः
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| तेषाम् | तद् (६.३) | Of them (the Dasharnas) |
| दिक्षु | दिश् (७.३) | in the region |
| प्रथितविदिशालक्षणाम् | प्रथित–विदिशा–लक्षणा (२.१) | known by the name Vidisha |
| राजधानीम् | राजधानी (२.१) | the capital city |
| गत्वा | गत्वा (√गम्+क्त्वा) | having gone |
| सद्यः | सद्यस् | immediately |
| फलम् | फल (२.१) | the fruit |
| अविकलम् | अविकल (२.१) | full |
| कामुकत्वस्य | कामुकत्व (६.१) | of your amorous nature |
| लब्धा | लब्धृ (१.१) | you will obtain |
| तीरोपान्तस्तनितसुभगम् | तीर–उपान्त–स्तनित–सुभग (२.१) | made pleasant by the rumbling near its banks |
| पास्यसि | पास्यसि (√पा कर्तरि लृट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you will drink |
| स्वादु | स्वादु (२.१) | sweet |
| यत् | यद् (२.१) | which |
| तत् | तद् (२.१) | that |
| सभ्रूभङ्गम् | स–भ्रू–भङ्ग (२.१) | with frowning eyebrows |
| मुखम् | मुख (२.१) | face |
| इव | इव | like |
| पयः | पयस् (२.१) | water |
| वेत्रवत्याः | वेत्रवती (६.१) | of the Vetravati river |
| चलोर्मि | चल–ऊर्मि (२.१) | with moving waves |
छन्दः
मन्दाक्रान्ता [१७: मभनततगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ते | षां | दि | क्षु | प्र | थि | त | वि | दि | शा | ल | क्ष | णां | रा | ज | धा | नीं |
| ग | त्वा | स | द्यः | फ | ल | म | वि | क | लं | का | मु | क | त्व | स्य | ल | ब्धा |
| ती | रो | पा | न्त | स्त | नि | त | सु | भ | गं | पा | स्य | सि | स्वा | दु | य | त्त |
| त्स | भ्रू | भ | ङ्गं | मु | ख | मि | व | प | यो | वे | त्र | व | त्या | श्च | लो | र्मि |
| म | भ | न | त | त | ग | ग | ||||||||||
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