कर्तुं यच्च प्रभवति महीमुच्छिलिन्ध्रामवन्ध्यं
तच्छ्रुत्वा ते श्रवणसुभगं गर्जितं मानसोत्काः ।
आ कैलासाद्बिसकिसलयच्छेदपाथेयवन्तः
संपत्स्यन्ते नभसि भवतो राजहंसाः सहायाः ॥
कर्तुं यच्च प्रभवति महीमुच्छिलिन्ध्रामवन्ध्यं
तच्छ्रुत्वा ते श्रवणसुभगं गर्जितं मानसोत्काः ।
आ कैलासाद्बिसकिसलयच्छेदपाथेयवन्तः
संपत्स्यन्ते नभसि भवतो राजहंसाः सहायाः ॥
तच्छ्रुत्वा ते श्रवणसुभगं गर्जितं मानसोत्काः ।
आ कैलासाद्बिसकिसलयच्छेदपाथेयवन्तः
संपत्स्यन्ते नभसि भवतो राजहंसाः सहायाः ॥
अन्वयः
AI
महीम् उच्छिलिन्ध्राम् अवन्ध्यं च कर्तुं यत् प्रभवति, ते तत् श्रवण-सुभगं गर्जितं श्रुत्वा मानस-उत्काः राज-हंसाः आ कैलासात् बिस-किसलय-च्छेद-पाथेय-वन्तः नभसि भवतः सहायाः संपत्स्यन्ते।
Summary
AI
Upon hearing the cloud's pleasant thunder, which makes the earth fertile with mushrooms, the royal swans, longing for Lake Mānasa, will accompany it in the sky as far as Mount Kailāsa, carrying tender lotus stalks as provisions for their journey.
सारांश
AI
धरती को अंकुरित करने वाली तुम्हारी सुखद गर्जना सुनकर मानसरोवर जाने के लिए उत्सुक राजहंस, कैलाश तक तुम्हारे साथी बनेंगे और रास्ते के लिए भोजन के रूप में कमलनाल के टुकड़े साथ रखेंगे।
वल्लभदेवः
तत्त्वदीयं ध्वनितमाकर्ण्य तव राजहंमा अनुचराः कैलासाद्रिपर्यन्तं भविष्यन्ति । यतो मानमोत्का मानमोत्काः मानसोन्मनसः । प्रावृषि हि ते शरणार्थं तत्र यान्ति । किं तद्गर्जितमित्याह । यन्महीमवनिमुच्छिलिन्ध्रामुद्भूतशिलिन्ध्राख्यकुमुमां विधातुं प्रभवति शक्नोति । तानि हि मेघगर्जितेन जायन्ते । अत एव तदवन्ध्यं सफलम् । श्रवणसुभगं कर्णसुखकारीति चाटुपदम् । कीदृशा हंसाः । बिसानां किसलयानि तेषां छेदः खण्डः स एव पाथेयमध्वभोजनं विद्यते येषां ते तथोक्ताः । बिसकिसलयच्छेदपाथेयवन्त इति विग्रहः । आ कैलासादित्यव्ययीभावो विभाषितः ॥
पदच्छेदः
AI
| कर्तुं | कर्तुम् (√कृ+तुमुन्) | to make |
| यत् | यद् (१.१) | which |
| च | च | and |
| प्रभवति | प्रभवति (प्र√भू कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | is able |
| महीम् | मही (२.१) | the earth |
| उच्छिलिन्ध्राम् | उद्-शिलिन्ध्रा (२.१) | with mushrooms sprouting |
| अवन्ध्यं | न-वन्ध्य (२.१) | fruitful |
| तत् | तद् (२.१) | that |
| श्रुत्वा | श्रुत्वा (√श्रु+क्त्वा) | having heard |
| ते | युष्मद् (६.१) | your |
| श्रवणसुभगं | श्रवण–सुभग (२.१) | pleasing to the ear |
| गर्जितं | गर्जित (√गर्ज्+क्त, २.१) | thunder |
| मानसोत्काः | मानस–उत्क (१.३) | eager for Lake Manasa |
| आ कैलासात् | आ–कैलास (५.१) | all the way to Kailasa |
| बिसकिसलयच्छेदपाथेयवन्तः | बिस–किसलय–छेद–पाथेयवत् (१.३) | having pieces of lotus stalks as provisions |
| संपत्स्यन्ते | संपत्स्यन्ते (सम्√पद् कर्तरि लृट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | will become |
| नभसि | नभस् (७.१) | in the sky |
| भवतः | भवत् (६.१) | your |
| राजहंसाः | राजहंस (१.३) | royal swans |
| सहायाः | सहाय (१.३) | companions |
छन्दः
मन्दाक्रान्ता [१७: मभनततगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क | र्तुं | य | च्च | प्र | भ | व | ति | म | ही | मु | च्छि | लि | न्ध्रा | म | व | न्ध्यं |
| त | च्छ्रु | त्वा | ते | श्र | व | ण | सु | भ | गं | ग | र्जि | तं | मा | न | सो | त्काः |
| आ | कै | ला | सा | द्बि | स | कि | स | ल | य | च्छे | द | पा | थे | य | व | न्तः |
| सं | प | त्स्य | न्ते | न | भ | सि | भ | व | तो | रा | ज | हं | साः | स | हा | याः |
| म | भ | न | त | त | ग | ग | ||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.