एतस्मान्मां कुशलिनमभिज्ञानदानाद्विदित्वा
मा कौलीनादसितनयने मय्यविश्वासिनी भूः ।
स्नेहानाहुः किमपि विरहह्रासिनस्ते ह्यभोगा-
दिष्टे वस्तुन्युपचितरसाः प्रेमराशीभवन्ति ॥
एतस्मान्मां कुशलिनमभिज्ञानदानाद्विदित्वा
मा कौलीनादसितनयने मय्यविश्वासिनी भूः ।
स्नेहानाहुः किमपि विरहह्रासिनस्ते ह्यभोगा-
दिष्टे वस्तुन्युपचितरसाः प्रेमराशीभवन्ति ॥
मा कौलीनादसितनयने मय्यविश्वासिनी भूः ।
स्नेहानाहुः किमपि विरहह्रासिनस्ते ह्यभोगा-
दिष्टे वस्तुन्युपचितरसाः प्रेमराशीभवन्ति ॥
अन्वयः
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असित-नयने! एतस्मात् अभिज्ञान-दानात् माम् कुशलिनम् विदित्वा कौलीनात् मयि अविश्वासिनी मा भूः; स्नेहान् विरह-ह्रासिनः आहुः (किन्तु) ते अ-भोगात् इष्टे वस्तुनि उपचित-रसाः प्रेम-राशी-भवन्ति ।
Summary
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The Yakṣa tells his dark-eyed wife that having received this token of recognition and knowing he is well, she should not doubt him due to rumors. He explains that while people say affection fades during separation, it actually increases and becomes a concentrated mass of love when the beloved is not present to be enjoyed.
सारांश
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इस पहचान से मुझे कुशल जानकर तुम लोकवाद के कारण मुझ पर अविश्वास मत करना। लोग कहते हैं कि वियोग में प्रेम कम हो जाता है, परंतु भोग न मिलने से प्रिय वस्तु के प्रति वह प्रेम और भी प्रगाढ़ होकर प्रेम-राशि बन जाता है।
वल्लभदेवः
हे कुवलयाक्ष्येतस्मादभिज्ञानदानान्मां स्वस्थमवेत्य कौलीनाल्लोकापवादमात्रान्मयि त्वमविश्वासिनी निष्प्रत्यया मा भूः । तदेव कौलीनमाह । किमपि कुतोऽपि हेतोः स्नेहान्विरहह्रासिनो वियोगे तनूभवतो जना प्राहुः । यथा । प्रीतिः प्रवासाश्रयादिति । एतच्चायुक्तम् । यस्मात्ते स्नेहा अभोगाद्धेतोरिष्टे वस्तुनीप्सितेऽर्थ उपचितरसाः सन्तः प्रेम्णो राशीभवन्ति प्रीतिमयाः संपद्यन्ते । हृदयवल्लभविषये वियोगवशात्सहस्रगुणः स्नेहः संपद्यत इत्यर्थः । त्वयि च मम या प्रीतिस्तां त्वमेव जानासि । कौलीनं लोकापवादः ॥
पदच्छेदः
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| एतस्मात् | एतद् (५.१) | From this |
| माम् | अस्मद् (२.१) | me |
| कुशलिनम् | कुशलिन् (२.१) | as being well |
| अभिज्ञानदानात् | अभिज्ञान–दान (५.१) | from the giving of this token |
| विदित्वा | विदित्वा (√विद्+क्त्वा) | having known |
| मा | मा | do not |
| कौलीनात् | कौलीन (५.१) | from gossip |
| असितनयने | असित–नयना (८.१) | O dark-eyed one |
| मयि | अस्मद् (७.१) | in me |
| अविश्वासिनी | अविश्वासिन् (१.१) | distrustful |
| भूः | भूः (√भू कर्तरि लुङ् (परस्मै.) म.पु. एक.) | be |
| स्नेहान् | स्नेह (२.३) | affections |
| आहुः | आहुः (√अह् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | they say |
| किमपि | किम्–अपि | somewhat |
| विरहह्रासिनः | विरह–ह्रासिन् (२.३) | as diminishing in separation |
| ते | तद् (१.३) | they (affections) |
| हि | हि | for |
| अभोगात् | अभोग (५.१) | from non-enjoyment |
| इष्टे | इष्ट (√इष्+क्त, ७.१) | in the beloved |
| वस्तुनि | वस्तु (७.१) | object |
| उपचितरसाः | उपचित–रस (१.३) | with accumulated flavour |
| प्रेमराशीभवन्ति | प्रेमराशीभवन्ति (√भू +च्वि कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | become a mass of love |
छन्दः
मन्दाक्रान्ता [१७: मभनततगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ए | त | स्मा | न्मां | कु | श | लि | न | म | भि | ज्ञा | न | दा | ना | द्वि | दि | त्वा |
| मा | कौ | ली | ना | द | सि | त | न | य | ने | म | य्य | वि | श्वा | सि | नी | भूः |
| स्ने | हा | ना | हुः | कि | म | पि | वि | र | ह | ह्रा | सि | न | स्ते | ह्य | भो | गा |
| दि | ष्टे | व | स्तु | न्यु | प | चि | त | र | साः | प्रे | म | रा | शी | भ | व | न्ति |
| म | भ | न | त | त | ग | ग | ||||||||||
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