शापान्तो मे भुजगशयनादुत्थिते शार्ङ्गपाणौ
मासानन्यान्गमय चतुरो लोचने मीलयित्वा ।
पश्चादावां विरहगुणितं तं तमात्माभिलाषं
निर्वेक्ष्यावः परिणतशरच्चन्द्रिकासु क्षपासु ॥
शापान्तो मे भुजगशयनादुत्थिते शार्ङ्गपाणौ
मासानन्यान्गमय चतुरो लोचने मीलयित्वा ।
पश्चादावां विरहगुणितं तं तमात्माभिलाषं
निर्वेक्ष्यावः परिणतशरच्चन्द्रिकासु क्षपासु ॥
मासानन्यान्गमय चतुरो लोचने मीलयित्वा ।
पश्चादावां विरहगुणितं तं तमात्माभिलाषं
निर्वेक्ष्यावः परिणतशरच्चन्द्रिकासु क्षपासु ॥
अन्वयः
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भुजग-शयनात् शार्ङ्ग-पाणौ उत्थिते मे शाप-अन्तः (भविष्यति), चतुरः अन्यान् मासान् लोचने मीलयित्वा गमय; पश्चात् आवाम् परिणत-शरद्-चन्द्रिकासु क्षपासु तम् तम् विरह-गुणितम् आत्म-अभिलाषम् निर्वेक्ष्यावः ।
Summary
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He explains that his curse will conclude when Lord Viṣṇu, the wielder of the Śārṅga bow, rises from his serpent bed. He asks her to endure the remaining four months with patience. Once reunited, they will satisfy their mutual desires, intensified by their long separation, during the beautiful nights illuminated by the full autumnal moon.
सारांश
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जब भगवान विष्णु शेषशैया से जागेंगे, तब मेरा शाप समाप्त होगा। शेष चार महीने तुम आँखें मूँदकर बिता लो। फिर हम विरह से बढ़ी हुई अपनी अभिलाषाओं को शरद ऋतु की चाँदनी रातों में जी भरकर पूरा करेंगे।
वल्लभदेवः
कार्त्तिकशुक्लद्वादश्यां भुजगशयनाच्छेषतल्पादुत्थिते शार्ङ्गपाणौ हरौ मम शापान्तो भविष्यति । तदैव वर्षस्य परिपूर्णत्वात् । अतश्चाद्यारभ्य मासचतुष्टयं लोचने मीलयित्वा यथाकथंचिद्गमयातिवाहय । ततः पश्चात्संयोगे मति चिरकालगुणितं तीक्ष्णं तं तं नानाविधमात्मनो अभिलाषं कामं परिपक्वशरदज्योत्स्नासु निशास्वावां निर्वेक्ष्याव उपभुञ्जावहे । लोचननिमीलनेनात्र यथातथात्वं लक्ष्यते ॥
पदच्छेदः
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| शापान्तः | शाप–अन्त (१.१) | The end of the curse |
| मे | अस्मद् (६.१) | my |
| भुजगशयनात् | भुजग–शयन (५.१) | from the serpent-bed |
| उत्थिते | उत्थित (उत्√स्था+क्त, ७.१) | when (he has) risen |
| शार्ङ्गपाणौ | शार्ङ्ग–पाणि (७.१) | when Sharngapani (Vishnu) |
| मासान् | मास (२.३) | months |
| अन्यान् | अन्य (२.३) | remaining |
| गमय | गमय (√गम् +णिच् कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | pass |
| चतुरः | चतुर् (२.३) | four |
| लोचने | लोचन (२.२) | (your) two eyes |
| मीलयित्वा | मीलयित्वा (√मील्+णिच्+क्त्वा) | having closed |
| पश्चात् | पश्चात् | afterwards |
| आवाम् | अस्मद् (१.२) | we two |
| विरहगुणितम् | विरह–गुणित (२.१) | multiplied by separation |
| तं | तद् (२.१) | that |
| तम् | तद् (२.१) | that |
| आत्माभिलाषं | आत्मन्–अभिलाष (२.१) | our own desires |
| निर्वेक्ष्यावः | निर्वेक्ष्यावः (निर्√विश् कर्तरि लृट् (आत्मने.) उ.पु. द्वि.) | we two will enjoy |
| परिणतशरच्चन्द्रिकासु | परिणत–शरद्–चन्द्रिका (७.३) | in the full autumn moonlight |
| क्षपासु | क्षपा (७.३) | in the nights |
छन्दः
मन्दाक्रान्ता [१७: मभनततगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| शा | पा | न्तो | मे | भु | ज | ग | श | य | ना | दु | त्थि | ते | शा | र्ङ्ग | पा | णौ |
| मा | सा | न | न्या | न्ग | म | य | च | तु | रो | लो | च | ने | मी | ल | यि | त्वा |
| प | श्चा | दा | वां | वि | र | ह | गु | णि | तं | तं | त | मा | त्मा | भि | ला | षं |
| नि | र्वे | क्ष्या | वः | प | रि | ण | त | श | र | च्च | न्द्रि | का | सु | क्ष | पा | सु |
| म | भ | न | त | त | ग | ग | ||||||||||
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