मामाकाशप्रणिहितभुजं निर्दयाश्लेषहेतो-
र्लब्धायास्ते कथमपि सति स्वप्नसंदर्शनेषु ।
पश्यन्तीनां न खलु बहुशो न स्थलीदेवतानां
मुक्तास्थूलास्तरुकिसलयेष्वस्रुलेशाः पतन्ति ॥
मामाकाशप्रणिहितभुजं निर्दयाश्लेषहेतो-
र्लब्धायास्ते कथमपि सति स्वप्नसंदर्शनेषु ।
पश्यन्तीनां न खलु बहुशो न स्थलीदेवतानां
मुक्तास्थूलास्तरुकिसलयेष्वस्रुलेशाः पतन्ति ॥
र्लब्धायास्ते कथमपि सति स्वप्नसंदर्शनेषु ।
पश्यन्तीनां न खलु बहुशो न स्थलीदेवतानां
मुक्तास्थूलास्तरुकिसलयेष्वस्रुलेशाः पतन्ति ॥
अन्वयः
AI
सति! स्वप्न-सन्दर्शनेषु कथम् अपि लब्धयाः ते निर्दय-आश्लेष-हेतोः आकाश-प्रणिहित-भुजम् माम् पश्यन्तीनाम् स्थली-देवतानाम् मुक्ता-स्थूलाः अस्रु-लेशाः बहुशः तरु-किसलयेषु न पतन्ति (इति) न खलु ।
Summary
AI
He tells his virtuous wife that when he occasionally finds her in his dreams, he reaches out his arms to the empty sky for a passionate embrace. Watching his pathetic state, the local forest deities are moved to tears. Their teardrops, as large as pearls, frequently fall upon the tender sprouts of the trees out of deep sympathy for his suffering.
सारांश
AI
स्वप्न में तुम्हें पाकर जब मैं गाढ़ आलिंगन के लिए आकाश में भुजाएँ फैलाता हूँ, तब मेरी वह दशा देखकर वन-देवताओं की आँखों से मोतियों जैसे बड़े-बड़े आँसू वृक्षों की कोपलों पर गिरने लगते हैं।
वल्लभदेवः
हे सति गुणवति तव स्वप्ने दैववशात्प्राप्ताया गाढालिङ्गनायाकाशे शून्य एव प्रसारितभुजं मां वीक्षमाणानां वनदेवतानां द्रुमपल्लवेषु मौक्तिकपृथवो वाष्पकणा असकृत् खलु न पतन्ति । अपि तु भ्रश्यन्त्येव । तादृशीं मे दशामालोक्य ता अपि कृपया रुदन्तितरामित्यर्थः ॥
पदच्छेदः
AI
| माम् | अस्मद् (२.१) | me |
| आकाशप्रणिहितभुजम् | आकाश–प्रणिहित–भुज (२.१) | with arms stretched out into the sky |
| निर्दयाश्लेषहेतोः | निर्दय–आश्लेष–हेतु (५.१) | for the sake of a merciless embrace |
| लब्धायाः | लब्ध (√लभ्+क्त, ६.१) | of you, who has been obtained |
| ते | युष्मद् (६.१) | of you |
| कथमपि | कथम्–अपि | somehow |
| सति | सत् (√अस्+शतृ, ७.१) | being (in the presence of) |
| स्वप्नसंदर्शनेषु | स्वप्न–संदर्शन (७.३) | in the visions of dreams |
| पश्यन्तीनाम् | पश्यन्ती (√दृश्+शतृ, ६.३) | of those (goddesses) who are watching |
| न | न | not |
| खलु | खलु | indeed |
| बहुशः | बहुशस् | often |
| न | न | not |
| स्थलीदेवतानाम् | स्थली–देवता (६.३) | of the land-deities |
| मुक्तास्थूलाः | मुक्ता–स्थूल (१.३) | large as pearls |
| तरुकिसलयेषु | तरु–किसलय (७.३) | on the tree sprouts |
| अस्रुलेशाः | अस्रु–लेश (१.३) | teardrops |
| पतन्ति | पतन्ति (√पत् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | fall |
छन्दः
मन्दाक्रान्ता [१७: मभनततगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मा | मा | का | श | प्र | णि | हि | त | भु | जं | नि | र्द | या | श्ले | ष | हे | तो |
| र्ल | ब्धा | या | स्ते | क | थ | म | पि | स | ति | स्व | प्न | सं | द | र्श | ने | षु |
| प | श्य | न्ती | नां | न | ख | लु | ब | हु | शो | न | स्थ | ली | दे | व | ता | नां |
| मु | क्ता | स्थू | ला | स्त | रु | कि | स | ल | ये | ष्व | स्रु | ले | शाः | प | त | न्ति |
| म | भ | न | त | त | ग | ग | ||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.