त्वामालिख्य प्रणयकुपितां धातुरागैः शिलाया-
मात्मानं ते चरणपतितं यावदिच्छामि कर्तुम् ।
अस्रैस्तावन्मुहुरुपचितैर्दृष्टिरालिप्यते मे
क्रूरस्तस्मिन्नपि न सहते संगमं नौ कृतान्तः ॥
त्वामालिख्य प्रणयकुपितां धातुरागैः शिलाया-
मात्मानं ते चरणपतितं यावदिच्छामि कर्तुम् ।
अस्रैस्तावन्मुहुरुपचितैर्दृष्टिरालिप्यते मे
क्रूरस्तस्मिन्नपि न सहते संगमं नौ कृतान्तः ॥
मात्मानं ते चरणपतितं यावदिच्छामि कर्तुम् ।
अस्रैस्तावन्मुहुरुपचितैर्दृष्टिरालिप्यते मे
क्रूरस्तस्मिन्नपि न सहते संगमं नौ कृतान्तः ॥
अन्वयः
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धातु-रागैः शिलायाम् प्रणय-कुपिताम् त्वाम् आलिख्य यावत् आत्मानम् ते चरण-पतितम् कर्तुम् इच्छामि, तावत् मे दृष्टिः मुहुः उपचितैः अस्रैः आलिप्यते; क्रूरः कृतान्तः तस्मिन् अपि नौ सङ्गमम् न सहते ।
Summary
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The Yakṣa attempts to paint a portrait of his wife on a rock using mineral pigments, depicting her as angry in love while he prostrates himself at her feet. However, his vision is repeatedly blurred by welling tears. He concludes that cruel fate is so heartless that it cannot tolerate their union even within the confines of a painting.
सारांश
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जब मैं शिला पर गेरु आदि रंगों से तुम्हें प्रेम-कलह में रूठी हुई चित्रित कर स्वयं को तुम्हारे चरणों में गिरा हुआ दिखाना चाहता हूँ, तब आँखों में आँसू भर आने से दृष्टि धुंधली हो जाती है। क्रूर विधाता चित्र में भी हमारा मिलन सहन नहीं कर पाता।
वल्लभदेवः
भवतीं प्रणयकुपितां प्रीत्या कपितां धातुरागैः सिन्दूरादिरागैर्दृषत्स्वालिख्य प्रार्थनयात्मानं तव पादगतं कर्तुं यावदिच्छामि तावत्त्वदाकारस्य स्मरणाद्बाष्परसकृदुपचितैवृद्धैश्चक्षुषी ममाच्छाद्येते । अतश्च तस्मिन्नपि त्वदाकारे तत्रापि चित्रे क्रूरो विषमो विधिर्नावावयोः समागमं न क्षमते ॥
पदच्छेदः
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| त्वाम् | युष्मद् (२.१) | you |
| आलिख्य | आलिख्य (आ√लिख्+ल्यप्) | having drawn |
| प्रणयकुपिताम् | प्रणय–कुपिता (२.१) | angry out of love |
| धातुरागैः | धातु–राग (३.३) | with mineral colors |
| शिलायाम् | शिला (७.१) | on a rock slab |
| आत्मानम् | आत्मन् (२.१) | myself |
| ते | युष्मद् (६.१) | your |
| चरणपतितम् | चरण–पतित (२.१) | fallen at the feet |
| यावत् | यावत् | as soon as |
| इच्छामि | इच्छामि (√इष् कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. एक.) | I wish |
| कर्तुम् | कर्तुम् (√कृ+तुमुन्) | to make |
| अस्रैः | अस्र (३.३) | with tears |
| तावत् | तावत् | then |
| मुहुः | मुहुस् | again and again |
| उपचितैः | उपचित (उप√चि+क्त, ३.३) | by the accumulated |
| दृष्टिः | दृष्टि (१.१) | my vision |
| आलिप्यते | आलिप्यते (आ√लिप् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is blurred |
| मे | अस्मद् (६.१) | my |
| क्रूरः | क्रूर (१.१) | cruel |
| तस्मिन् | तद् (७.१) | in that (picture) |
| अपि | अपि | even |
| न | न | not |
| सहते | सहते (√सह् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | tolerates |
| संगमम् | संगम (२.१) | union |
| नौ | अस्मद् (६.२) | of us two |
| कृतान्तः | कृतान्त (१.१) | Fate |
छन्दः
मन्दाक्रान्ता [१७: मभनततगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त्वा | मा | लि | ख्य | प्र | ण | य | कु | पि | तां | धा | तु | रा | गैः | शि | ला | या |
| मा | त्मा | नं | ते | च | र | ण | प | ति | तं | या | व | दि | च्छा | मि | क | र्तुम् |
| अ | स्रै | स्ता | व | न्मु | हु | रु | प | चि | तै | र्दृ | ष्टि | रा | लि | प्य | ते | मे |
| क्रू | र | स्त | स्मि | न्न | पि | न | स | ह | ते | सं | ग | मं | नौ | कृ | ता | न्तः |
| म | भ | न | त | त | ग | ग | ||||||||||
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