अन्वयः
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चलितमानसोर्मयः पद्मभेदपिशुनाः गन्धमादनवनान्तमारुताः क्षणं शिथिलितोपगूहनौ तौ दम्पती सिषेविरे।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
ताविति । शिथिलितोपगूहनौ शिथिलितालिङ्गनौ । जाया च पतिश्चदंपती । जायाशब्दस्य दंभावो निपातितः तौ शिवौ रचितमानसोर्मयः । मानसे सरसि रचिततरङ्गा इत्यर्थः । पद्मभेदनिपुणाः । पद्मभेदपिशुना इति यावत् । विकाससूचका इत्यर्थः । गन्धमादनवनान्तमारुताः क्षणं सिषेविरे
Summary
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The breezes from the edges of the Gandhamadana forest, which indicated the blossoming of lotuses and stirred waves of emotion in the mind, served the couple for a moment as they loosened their embrace.
सारांश
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आलिंगन ढीला होने पर उस दम्पति को कमलों के खिलने की सूचना देने वाली और मानसरोवर की लहरों को थपथपाने वाली गन्धमादन की वायु ने सुख दिया।
पदच्छेदः
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| तौ | तद् (२.२) | the two of them |
| क्षणम् | क्षणम् | for a moment |
| शिथिलितोपगूहनौ | शिथिलित (√शिथिल+इतच्)–उपगूहन (२.२) | who had loosened their embrace |
| दम्पती | दम्पती (२.२) | the couple |
| चलितमानसोर्मयः | चलित (√चल्+क्त)–मानस–ऊर्मि (१.३) | which stirred waves in the mind |
| पद्मभेदपिशुनाः | पद्म–भेद–पिशुन (१.३) | which indicated the blossoming of lotuses |
| सिषेविरे | सिषेविरे (√सेव् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | served |
| गन्धमादनवनान्तमारुताः | गन्धमादन–वन–अन्त–मारुत (१.३) | the winds from the edge of the Gandhamadana forest |
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| तौ | क्ष | णं | शि | थि | लि | तो | प | गू | ह | नौ |
| द | म्प | ती | च | लि | त | मा | न | सो | र्म | यः |
| प | द्म | भे | द | पि | शु | नाः | सि | षे | वि | रे |
| ग | न्ध | मा | द | न | व | ना | न्त | मा | रु | ताः |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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