अन्वयः
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बुधस्तवोचितः सः उषसि मूर्च्छनापरिगृहीतकैशिकैः किन्नरैः गीतमङ्गलः (सन्) शतकुम्भकमलाकरैः समं व्यबुध्यत।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
स इति । बुधस्तवोचितो विद्वत्स्तोत्रार्हः स हर उषसि प्रभाते । स्वराणामारोहक्रमो मूर्च्छना । `क्रमयुक्ताः स्वरास्तत्र मूर्च्छना परिकीर्तिता` इति भरतः । तया मूर्च्छनया परिगृहीतकैशिकैः स्वीकृतरागविशेषैः किंनरैर्गीतमङ्गलः सन् । शातकुम्भकमलाकरैः समं कनकपद्माकरैः सह । `तपनीयं शातकुम्भं गाङ्गेयं भर्म कबुर्रम्` इत्यमरः । व्यबुध्यत विबुद्धवान् । बुध्यतेर्दैवादिकात्कर्तरि लङ् । अत्र बुध्यतेर्जागरविकासयोर्वोधयोः श्लेषनिमित्तकाभेदाध्यवसायमूला सहोक्तिरलंकारः
Summary
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He, who is worthy of the praise of the wise, awoke at dawn simultaneously with the golden lotus ponds, serenaded by auspicious songs sung by the Kinnaras in the Kaishika raga with its melodic modulations.
सारांश
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उषाकाल में स्वर्ण-कमलों के खिलने के साथ ही, किन्नरों द्वारा श्रेष्ठ रागों में गाए गए मांगलिक गीतों से स्तुति-योग्य शिव की निद्रा खुली।
पदच्छेदः
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| सः | तद् (१.१) | he |
| व्यबुध्यत | व्यबुध्यत (वि√बुध् कर्तरि लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | awoke |
| बुधस्तवोचितः | बुध–स्तव–उचित (१.१) | who is worthy of the praise of the wise |
| शतकुम्भकमलाकरैः | शतकुम्भ–कमल–आकर (३.३) | with the golden lotus ponds |
| समम् | समम् | simultaneously |
| मूर्च्छनापरिगृहीतकैशिकैः | मूर्च्छना–परिगृहीत (परि√ग्रह्+क्त)–कैशिक (३.३) | with the Kaishika raga adopted with musical modulations |
| किन्नरैः | किन्नर (३.३) | by the Kinnaras |
| उषसि | उषस् (७.१) | at dawn |
| गीतमङ्गलः | गीत–मङ्गल (१.१) | for whom auspicious songs were sung |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | व्य | बु | ध्य | त | बु | ध | स्त | वो | चि | तः |
| श | त | कु | म्भ | क | म | ला | क | रैः | स | मम् |
| मू | र्च्छ | ना | प | रि | गृ | ही | त | कै | शि | कैः |
| कि | न्न | रै | रु | ष | सि | गी | त | म | ङ्ग | लः |
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