अन्वयः
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वधूरतं चुम्बनेषु अधरदानवर्जितं, अदयोपगूहने सन्नहस्तं, क्लिष्टमन्मथम् अपि प्रभोः प्रियं च आसीत्, यतः दुर्लभप्रतिकृतम् आसीत्।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
चुम्बनेष्विति । चुम्बनेष्वधरदानवर्जितमोष्ठार्पणरहितमदयोपगूहने निर्दयालिङ्गने सन्नौ स्तब्धौ हस्तौ करौ यस्मिंस्तत्तथोक्तम् । तथा दुर्लभप्रतिकृतम् । प्रगल्भत्वान्नखदन्तताडनाद्यकृतप्रयत्नमित्यर्थः । अत एव क्लिष्टमन्मथं लज्जयोपरुद्धमदनमपि वध्वा नवोढाया रतं वधूरतं प्रभोरीश्वरस्य प्रियम् । अभूदिति शेषः । `वधूः स्नुषानवोढास्त्रीभार्यासृष्टाङ्गनासु च` इति विश्वः । अयं लज्जासाध्वसाभ्यां संकुचितोपचारत्वात्संक्लिष्टसंभोगः । तदुक्तं भूपालेन-(युवानौ यत्र संक्षिप्तसाध्वसव्रीडयादिभिः । उपचारान्निषेवन्ते स संक्लिष्ट इतीरितः ।) इति
Summary
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The love-play of the bride—withholding her lips in kisses, her hands limp during a forceful embrace, and her passion restrained—was still dear to her Lord, because her reciprocation was hard to obtain.
सारांश
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चुंबन के समय अधर न देना और आलिंगन में शिथिल रहना—यद्यपि पार्वती की ओर से रति की चेष्टाएँ कम थीं, फिर भी महादेव को उनका यह व्यवहार अत्यंत प्रिय था।
पदच्छेदः
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| चुम्बनेषु | चुम्बन (७.३) | In kisses |
| अधरदानवर्जितम् | अधर–दान–वर्जित (१.१) | withholding her lips |
| सन्नहस्तम् | सन्न (√सद्+क्त)–हस्त (१.१) | with hands limp |
| अदयोपगूहने | अदय–उपगूहन (७.१) | during a forceful embrace |
| क्लिष्टमन्मथम् | क्लिष्ट (√क्लिश्+क्त)–मन्मथ (१.१) | with passion restrained |
| अपि | अपि | still |
| प्रियम् | प्रिय (१.१) | was dear |
| प्रभोः | प्रभु (६.१) | to her Lord |
| दुर्लभप्रतिकृतम् | दुर्लभ–प्रतिकृत (१.१) | because reciprocation was hard to obtain |
| वधूरतम् | वधू–रत (१.१) | The love-play of the bride |
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| चु | म्ब | ने | ष्व | ध | र | दा | न | व | र्जि | तं |
| स | न्न | ह | स्त | म | द | यो | प | गू | ह | ने |
| क्लि | ष्ट | म | न्म | थ | म | पि | प्रि | यं | प्र | भो |
| र्दु | र्ल | भ | प्र | ति | कृ | तं | व | धू | र | तम् |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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