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शूलिनः करतलद्वयेन सा
संनिरुध्य नयने हृतांशुका ।
तस्य पश्यति ललाटलोचने
मोघयत्नविधुरा रहस्यभूत् ॥

अन्वयः AI हृतांशुका सा शूलिनः नयने करतलद्वयेन संनिरुध्य, तस्य ललाटलोचने पश्यति सति, रहसि मोघयत्नविधुरा अभूत्।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) शूलिन इति । सा पार्वती रहसि हृतांशुका प्रियेणाकृष्टवस्त्रा सती करतलद्वयेन । स्वकीयेनेत्यर्थः । शूलिनो हरस्य नयने नेत्रद्वयं संनिरुध्य संच्छाद्य तस्य शूलिनो ललाटलोचने तृतीयेऽक्ष्णि पश्यति सति मोघयत्नाखिलप्रयासात एव विधुराभूत् । तृतीयकराभावादिति भावः । एते न किंचिद्धार्ष्ट्यादयो व्यज्यन्ते
Summary AI Her garment taken away, she covered Shiva's two eyes with both her hands. But as his forehead-eye was watching, she became distressed in private, her effort having been in vain.
सारांश AI वस्त्र हरण के समय पार्वती ने अपने दोनों हाथों से शिव के नेत्रों को ढक दिया, किंतु उनके ललाट पर स्थित तीसरे नेत्र को देख वह लज्जा से व्याकुल हो गईं और उनका प्रयास विफल रहा।
पदच्छेदः AI
शूलिनःशूलिन् (६.१) of Shulin (Shiva)
करतलद्वयेनकरतलद्वय (३.१) with both her hands
सातद् (१.१) she
संनिरुध्यसंनिरुध्य (सम्+नि√रुध्+ल्यप्) having covered
नयनेनयन (२.२) the two eyes
हृतांशुकाहृत (√हृ+क्त)अंशुक (१.१) her garment taken away
तस्यतद् (६.१) his
पश्यतिपश्यत् (√दृश्+शतृ, ७.१) while was watching
ललाटलोचनेललाटलोचन (७.१) the forehead-eye
मोघयत्नविधुरामोघयत्नविधुर (१.१) distressed with futile effort
रहसिरहस् (७.१) in private
अभूत्अभूत् (√भू कर्तरि लुङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) became
छन्दः रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
शू लि नः द्व ये सा
सं नि रु ध्य ने हृ तां शु का
स्य श्य ति ला लो ने
मो त्न वि धु रा स्य भूत्
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