अन्वयः
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इयं गन्धमादनवनाधिदेवता स्वयं लोहितार्कमणिभाजनार्पितं कल्पवृक्षमधु बिभ्रती, स्थितिमतीं त्वाम् उपस्थिता।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
लोहितेति । लोहितेऽरुणेऽर्कमणिभाजने सूर्यकान्तपात्रेऽर्पितं कल्पवृक्षमधु = कल्पतरुप्रसूतं मद्यं, स्वयं बिभ्रती गन्धमादनवनाधिदेवता स्थितिमतीमवस्थानवतीम् । इह स्ववने तिष्ठन्तीमित्यर्थः । त्वामियं प्रत्यक्षोपस्तिता प्राप्ता । स्वगृहागतां त्वां सम्भावयितुमागतेत्यर्थः
Summary
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The presiding deity of the Gandhamadana forest, herself holding wine from the wish-fulfilling tree served in a ruby vessel, has approached you, who are full of dignity.
सारांश
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लाल मणि के पात्र में कल्पवृक्ष का मद्य लेकर, गंधमादन पर्वत की वन-देवी स्वयं मर्यादापूर्वक तुम्हारी सेवा में उपस्थित हुई है।
पदच्छेदः
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| लोहितार्कमणिभाजनार्पितम् | लोहित–अर्कमणि–भाजन–अर्पित (√ऋ+णिच्+क्त, २.१) | served in a vessel of red ruby |
| कल्पवृक्षमधु | कल्पवृक्ष–मधु (२.१) | the wine of the Kalpa tree |
| बिभ्रती | बिभ्रत् (√भृ+शतृ, १.१) | holding |
| स्वयम् | स्वयम् | herself |
| त्वाम् | युष्मद् (२.१) | you |
| इयम् | इदम् (१.१) | this |
| स्थितिमतीम् | स्थितिमत् (२.१) | who are full of dignity |
| उपस्थिता | उपस्थित (उप√स्था+क्त, १.१) | has approached |
| गन्धमादनवनाधिदेवता | गन्धमादन–वन–अधिदेवता (१.१) | the presiding deity of the Gandhamadana forest |
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| लो | हि | ता | र्क | म | णि | भा | ज | ना | र्पि | तं |
| क | ल्प | वृ | क्ष | म | धु | बि | भ्र | ती | स्व | यम् |
| त्वा | मि | यं | स्थि | ति | म | ती | मु | प | स्थि | ता |
| ग | न्ध | मा | द | न | व | ना | धि | दे | व | ता |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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