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पाकभिन्नशरकाण्डगौरयो-
रुल्लसत्प्रतिकृतिप्रसन्नयोः ।
रोहतीव तव गण्डलेखयो-
श्चन्द्रबिम्बनिहिताक्ष्णि चन्द्रिका ॥

अन्वयः AI तव पाकभिन्नशरकाण्डगौरयोः उल्लसत्प्रतिकृतिप्रसन्नयोः गण्डलेखयोः, चन्द्रबिम्बे निहितम् अक्षिणि (सति), चन्द्रिका रोहति इव।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) पाकेति । हे चन्द्रबिम्बनिहिताक्षि हे चन्द्रविनिहितेक्षणे । पाकभिन्नः पाकविकसितो यः शरकाण्डस्तद्वद्गौरयोः सितयोः । `अवदातः सितौ गौरः` इत्यमरः । उल्लसन् प्रकृतिकजः प्रसादः स्वभावजः प्रसादः (प्रसन्नता) ययोरतयोः सपदि रोहतीव आरोहणं करोतीवेत्युत्प्रेक्षा । प्रोज्ज्वलयोस्तव गण्डलेखयोश्चन्द्रिका रोहतीव । गण्डस्थलप्रतिबिम्बसंक्रमणमूर्छिता चन्द्रिका तयोरेव प्ररुढेति प्रतीयत इत्यर्थः
Summary AI Shiva says to Parvati: "The moonlight seems to grow upon your cheeks, which are as fair as ripened reed stalks and clear with a shining reflection, as if its eye is fixed on the disc of the moon."
सारांश AI गोरे और चमकते तुम्हारे कपोलों पर पड़ी चांदनी ऐसी लग रही है, मानों चंद्रमा में टिकी तुम्हारी दृष्टि की कांति ही तुम्हारे गालों पर फैल गई हो।
पदच्छेदः AI
पाकभिन्नशरकाण्डगौरयोःपाकभिन्नशरकाण्डगौर (७.२) on the two, fair like ripened reed-stalks,
उल्लसत्प्रतिकृतिप्रसन्नयोःउल्लसत् (उत्√लस्+शतृ)प्रतिकृतिप्रसन्न (७.२) on the two, clear with a shining reflection,
रोहतिरोहति (√रुह् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) grows
इवइव as if
तवयुष्मद् (६.१) your
गण्डलेखयोःगण्डलेखा (७.२) on the two cheeks
चन्द्रबिम्बनिहिताक्ष्णिचन्द्रबिम्बनिहित (नि√धा+क्त)–अक्षिन् (७.१) when the eye is placed on the moon's disc
चन्द्रिकाचन्द्रिका (१.१) the moonlight
छन्दः रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
पा भि न्न का ण्ड गौ यो
रु ल्ल त्प्र ति कृ ति प्र न्न योः
रो ती ण्ड ले यो
श्च न्द्र बि म्ब नि हि ता क्ष्णि न्द्रि का
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