अन्वयः
AI
उच्छ्वसितपीतम् ऐन्दवम् प्रभारसम् वोढुम् अक्षमम् इव, मुक्तषट्पदविरावम् एतत् कुमुदम् अञ्जसा आ निबन्धनात् भिद्यते।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
एतदिति । एतत्कुमुदं कैरवं कर्तृ उच्छ्वसितेन पीतमुच्छ्वसितपीतम् । अतितृष्णयोच्छ्वस्योच्छ्वस्य पीतमित्यर्थः । इन्दोरिदमैन्दवं प्रभा चन्द्रिका सैव रसो द्रवस्तं सोढुमक्षममिवाञ्जसा मुक्तषट्पदविरावं प्रवर्तितभृङ्गनादं यथा तथा निबन्धनादा वृन्ताद्भिद्यते विकसति । कर्मकर्तरि लट् । यथा लोके कस्यचिदतिपानान्निःसहात्मन उच्चैः क्रोशत उदरं भिद्यते तथैतदिति भावः
Summary
AI
The night-lotus, having drunk the moon's nectar-like light as it bloomed, now bursts open right down to its stalk, as if unable to bear it, releasing the humming of bees.
सारांश
AI
चंद्रमा की किरणों के रस को अत्यधिक पी लेने के कारण यह कुमुद, भौरों के गुंजन को छोड़ते हुए अपनी पंखुड़ियों से मानों खिलकर फट गया है।
पदच्छेदः
AI
| एतत् | एतद् (१.१) | This |
| उच्छ्वसितपीतम् | उच्छ्वसित–पीत (२.१) | drunk as it bloomed |
| ऐन्दवम् | ऐन्दव (२.१) | lunar |
| वोढुम् | वोढुम् (√वह्+तुमुन्) | to bear |
| अक्षमम् | अ–क्षम (१.१) | unable |
| इव | इव | as if |
| प्रभारसम् | प्रभा–रस (२.१) | nectar-like light |
| मुक्तषट्पदविरावम् | मुक्त–षट्पद–विराव (२.१) | releasing the humming of bees |
| अञ्जसा | अञ्जसा | suddenly |
| भिद्यते | भिद्यते (√भिद् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | bursts open |
| कुमुदम् | कुमुद (१.१) | night-lotus |
| आ | आ | down to |
| निबन्धनात् | निबन्धन (५.१) | its stalk |
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ए | त | दु | च्छ्व | सि | त | पी | त | मै | न्द | वं |
| वो | ढु | म | क्ष | म | मि | व | प्र | भा | र | सम् |
| मु | क्त | ष | ट्प | द | वि | रा | व | म | ञ्ज | सा |
| भि | द्य | ते | कु | मु | द | मा | नि | ब | न्ध | नात् |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.