अन्वयः
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तव कर्णपूररचनाकृते ओषधिपतेः नवोदयाः अप्रगल्भयवसूचिकोमलाः कराः अग्रनखसंपुटैः छेत्तुम् शक्यम् अस्ति।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
शक्यमिति । नवोदयाः सद्य उत्पादिता अप्रगल्भयवसूचिकोमला अकठोरयवाङ्करसुकुमारा ओषधिपतेरिन्दोः करास्तव कर्णपूररचनाकृते कर्णावतंसनिर्माणक्रियायां । संपदादित्वाद्भावे क्विप् । अग्रनखसंपुटैर्नखाग्रसंभेदैश्छेत्तुं शक्यम् । शक्या इत्यर्थः । `शकिसहोश्च` (अष्टाध्यायी ३.१.९९ ) । इति कर्मणि यत्प्रत्ययः । शक्यमिति विपरीतलिङ्गवचनस्यापि सामान्योपक्रमात्कर्माभिधायकत्वम् । पश्चात्कर्मविशेषाकाङ्क्षायां करा इति निर्देशो न विरुध्यते । यथाह वामनः- `शक्यमिति रुपं लिङ्गवचनस्यापि सामान्योपक्रमत्वादिति । अत्र प्रमाणम्-शक्यं श्वमांसेनापि क्षुत्प्रतिहन्तुमिति भाष्यकारप्रयोगः, इति
Summary
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"For making your ear-ornaments, it is possible to pluck the newly risen rays of the moon, the lord of herbs, which are as tender as unripe barley sprouts, with the tips of your fingernails."
सारांश
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चंद्रमा की नई किरणें जौ की कोमल कोपलों के समान हैं, जिन्हें तुम्हारे कानों के आभूषण बनाने के लिए नाखूनों से सहज ही तोड़ा जा सकता है।
पदच्छेदः
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| शक्यम् | शक्य (√शक्+यत्, १.१) | it is possible |
| ओषधिपतेः | ओषधि–पति (६.१) | of the lord of herbs (the moon) |
| नवोदयाः | नव–उदय (१.३) | newly risen |
| कर्णपूररचनाकृते | कर्ण–पूर–रचना–कृते | for the sake of making your ear-ornaments |
| तव | युष्मद् (६.१) | your |
| अप्रगल्भयवसूचिकोमलाः | अ–प्रगल्भ–यव–सूचि–कोमल (१.३) | as tender as unripe barley sprouts |
| छेत्तुम् | छेत्तुम् (√छिद्+तुमुन्) | to pluck |
| अग्रनखसंपुटैः | अग्र–नख–संपुट (३.३) | with the cups of your fingertips |
| कराः | कर (१.३) | rays |
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| श | क्य | मो | ष | धि | प | ते | र्न | वो | द | याः |
| क | र्ण | पू | र | र | च | ना | कृ | ते | त | व |
| अ | प्र | ग | ल्भ | य | व | सू | चि | को | म | ला |
| श्छे | त्तु | म | ग्र | न | ख | सं | पु | टैः | क | राः |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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