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सोऽयमानतशिरोधरैर्हयैः
कर्णचामरविघट्टितेक्षणैः ।
अस्तमेति युगभुग्नकेसरैः
संनिधाय दिवसं महोदधौ ॥

अन्वयः AI सः अयम् भानुः आनतशिरोधरैः, कर्णचामरविघट्टितेक्षणैः, युगभुग्नकेसरैः हयैः दिवसम् महोदधौ संनिधाय अस्तम् एति।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) स इति । सोऽयं भानुर्दिवसं महोदधौ संनिधाय निधायेत्यर्थः दिवसस्यादर्शनादियमुत्प्रेक्षा । आनतशिरोधरैर्गगनावतरणान्नम्रकन्धरैरतएव कर्णचामरविघट्टितेक्षणैर्युगभुग्नकेसरैः कुटिलितस्कन्धरोमभिर्हयैरस्तमेति । `अस्तस्तु चरमक्षमाभृत्` इत्यमरः
Summary AI 'This sun, having deposited the day in the great ocean, now sets, drawn by his horses. Their necks are bent, their eyes are brushed by the chowries on their ears, and their manes are curved by the yoke.'
सारांश AI सूर्य अब दिन को समुद्र में छिपाकर अस्त हो रहे हैं। उनके घोड़ों ने सिर झुका लिए हैं, चामर जैसे कानों से उनकी आँखें ढकी हैं और जुए से अयाल झुक गई है।
पदच्छेदः AI
सःतद् (१.१) He,
अयम्इदम् (१.१) this (sun),
आनतशिरोधरैःआनत (आ√नम्+क्त)शिरोधर (३.३) with necks bent down,
हयैःहय (३.३) by horses
कर्णचामरविघट्टितेक्षणैःकर्णचामरविघट्टित (वि√घट्ट्+क्त)ईक्षण (३.३) whose eyes are brushed by the ear-chowries,
अस्तम्अस्तम् to setting
एतिएति (√इ कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) goes,
युगभुग्नकेसरैःयुगभुग्न (√भुज्+क्त)केसर (३.३) and whose manes are bent by the yoke,
संनिधायसंनिधाय (सम्+नि√धा+ल्यप्) having deposited
दिवसम्दिवस (२.१) the day
महोदधौमहत्उदधि (७.१) in the great ocean.
छन्दः रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
सो ऽय मा शि रो रै र्ह यैः
र्ण चा वि ट्टि ते क्ष णैः
स्त मे ति यु भु ग्न के रैः
सं नि धा दि सं हो धौ
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