अन्वयः
AI
अथ सकम्पया तया शङ्करस्य नाभिदेशनिहितः करः रुरुधे। तत् दुकूलं च स्वयं दूरम् उच्छ्वसितनीविबन्धनम् अभवत्।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
नाभीति । नाभिदेशनिहितः । नीवीमोचनायेति शेषः । शंकरस्य करः सकम्पया वेपथुमत्या । प्रियकरस्पर्शादुत्पन्नसात्विकभावयेत्यर्थः । तया पार्वत्या रुरुधे निवारितः । अथ च । तथापीत्यर्थः । तद्दुकूलं स्वयं स्वत एव दूरमत्यन्तमुच्छ्वसितं स्स्तं नीवीबन्धनं नीवीग्रन्थिर्यस्य तत्तथाभूतमभवत् । रतिपारवश्यादिति भावः
Summary
AI
Then, with her trembling hand, she stopped Shankara's hand which was placed on her navel region. And her silk garment, its knot loosened, spontaneously fell away.
सारांश
AI
शिव का हाथ नाभि के पास पहुँचने पर पार्वती ने कांपते हाथों से उन्हें रोका, किंतु उनके रेशमी वस्त्र की गाँठ स्वयं ही ढीली होकर खुल गई।
पदच्छेदः
AI
| नाभिदेशनिहितः | नाभि–देश–निहित (नि√धा+क्त, १.१) | placed on the navel region |
| सकम्पया | सकम्प (३.१) | by the trembling |
| शङ्करस्य | शङ्कर (६.१) | of Shankara |
| रुरुधे | रुरुधे (√रुध् भावकर्मणोः लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was stopped |
| तया | तद् (३.१) | by her |
| करः | कर (१.१) | hand |
| तद्दुकूलम् | तत्–दुकूल (१.१) | Her silk garment |
| अथ | अथ | Then |
| च | च | and |
| अभवत् | अभवत् (√भू कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | became |
| स्वयम् | स्वयम् | spontaneously |
| दूरम् | दूरम् | away |
| उच्छ्वसितनीविबन्धनम् | उच्छ्वसित (उद्√श्वस्+क्त)–नीवि–बन्धन (१.१) | its knot loosened |
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ना | भि | दे | श | नि | हि | तः | स | क | म्प | या |
| श | ङ्क | र | स्य | रु | रु | धे | त | या | क | रः |
| त | द्दु | कू | ल | म | थ | चा | भ | व | त्स्व | यं |
| दू | र | मु | च्छ्व | सि | त | नी | वि | ब | न्ध | नम् |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.