सोऽनुमान्य हिमवन्तमात्मभू-
रात्मजाविरहदुःखखेदितम् ।
तत्र तत्र विजहार संपत-
न्नप्रमेयगतिना ककुद्मता ॥

अन्वयः AI आत्मभूः सः आत्मजाविरहदुःखखेदितं हिमवन्तम् अनुमान्य, अप्रमेयगतिना ककुद्मता संपतन् तत्र तत्र विजहार।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) स इति । स आत्मभूः शिव आत्मजाया दुहितुर्विरहदुःखेन पीडितं हिमवन्तमनुमान्यानुमतं कृत्वा अप्रमेयगतिनापरिच्छेद्यगतिना ककुद्मता वृषेण संचरन्संचरमाणस्तत्र तत्र नानादेशेषु विजहार
Summary AI He, the self-existent one (Shiva), after taking leave of Himavat who was distressed by the sorrow of separation from his daughter, roamed here and there, flying with his bull (Nandi) of immeasurable speed.
सारांश AI ब्रह्मा ने पुत्री के विरह से दुखी हिमालय को सांत्वना दी। तदुपरांत शिव अमेय गति वाले नंदी पर सवार होकर विभिन्न प्रदेशों में विहार करने लगे।
पदच्छेदः AI
सःतद् (१.१) He
अनुमान्यअनुमान्य (अनु√मन्+ल्यप्) after taking leave of
हिमवन्तम्हिमवत् (२.१) Himavat
आत्मभूःआत्मभू (१.१) the self-existent one (Shiva)
आत्मजाविरहदुःखखेदितम्आत्मजाविरहदुःखखेदित (√खिद्+क्त, २.१) distressed by the sorrow of separation from his daughter
तत्रतत्र here
तत्रतत्र and there
विजहारविजहार (वि√हृ कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) roamed
संपतन्संपतन् (सम्√पत्+शतृ, १.१) flying
अप्रमेयगतिनाप्रमेयगति (३.१) of immeasurable speed
ककुद्मताककुद्मत् (३.१) with his bull
छन्दः रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
सो ऽनु मा न्य हि न्त मा त्म भू
रा त्म जा वि दुः खे दि तम्
त्र त्र वि हा सं
न्न प्र मे ति ना कु द्म ता
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