अन्वयः
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शङ्करः अपि चुम्बनात् अलकचूर्णदूषितं ललाटजं नयनम् उच्छ्वसत्कमलगन्धये पार्वतीवदनगन्धवाहिने उच्छ्वासाय ददौ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
चुम्बनादिति । अथ शंकरोऽपि चुम्बनाच्चुम्बनार्थितोऽलकचूर्णेन दूषितमुपहतं ललाटजं नयनमुच्छ्वसत्कमलगन्धये विकचारविन्दगन्धधारिणे । `उपमानाच्च` (अष्टाध्यायी ५.४.१३७ ) इतीकारः । पार्वत्या वदनगन्धवाहिने । फूत्कारमारुतायेत्यर्थः । एतेन देव्याः प्रियवशंवदत्वमुक्तम् । अत्र हरचक्षुष्यलकचूर्णकथनाद्देव्या उपरिभावः सूचितः
Summary
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Shankara, too, offered his forehead-eye, which was soiled by the powder from her hair-locks during a kiss, to her breath, which carried the fragrance of a blooming lotus, to have it cleaned.
सारांश
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चुंबन के समय पार्वती के केशों के चूर्ण से धुंधले हुए अपने ललाट-नेत्र को शिव ने पार्वती के मुख की कमल जैसी सुगंधित श्वास से सुख प्रदान किया।
पदच्छेदः
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| चुम्बनात् | चुम्बन (५.१) | from a kiss |
| अलकचूर्णदूषितम् | अलक–चूर्ण–दूषित (√दूष्+क्त, २.१) | soiled by the powder from her hair-locks |
| शङ्करः | शङ्कर (१.१) | Shankara |
| अपि | अपि | too |
| नयनम् | नयन (२.१) | eye |
| ललाटजम् | ललाट–ज (२.१) | born of the forehead |
| उच्छ्वसत्कमलगन्धये | उच्छ्वसत् (उद्√श्वस्+शतृ)–कमल–गन्ध (४.१) | which had the fragrance of a blooming lotus |
| ददौ | ददौ (√दा कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | offered |
| पार्वतीवदनगन्धवाहिने | पार्वती–वदन–गन्ध–वाहिन् (४.१) | to her breath which carried the fragrance |
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| चु | म्ब | ना | द | ल | क | चू | र्ण | दू | षि | तं |
| श | ङ्क | रो | ऽपि | न | य | नं | ल | ला | ट | जम् |
| उ | च्छ्व | स | त्क | म | ल | ग | न्ध | ये | द | दौ |
| पा | र्व | ती | व | द | न | ग | न्ध | वा | हि | ने |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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