अन्वयः
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वेदनाविधुतहस्तपल्लवा अम्बिका दष्टमुक्तम् अधरोष्ठं शूलिनः शीतलेन मौलिचन्द्रशकलेन क्षणं निरवापयत्।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
दष्टमिति । अम्बिका पार्वती दष्टश्चासौ मुक्तश्च तं दष्टमुक्तम् । `पूर्वकालैकसर्वजरत्पुराणनवकेवलाः समानाधिकरणेन` (अष्टाध्यायी २.१.४९ ) इत्यनेन समासः । अधरोष्ठं वेदनया विधुतौ कम्पितौ हस्तपल्लवौ पाणिपल्लवौ यस्याः सा तथोक्ता सती शीतलेन शूलिनो मौलिचन्द्रशकलेन क्षणं निरवापयत् । शीतलोपचारेण निर्व्यथमकरोदिति विश्रम्भोक्तिः । निर्वातेर्धातोर्ण्यन्तात् `अर्तिह्रीव्लीरीक्नूयीक्ष्माय्यातां पुङ्णौ` (अष्टाध्यायी ७.३.३६ ) इत्यनेन पुगागमः । अत्राधरपीडनात्सुखेऽपि दुःखवदुपचारात्कुट्टिमनामानुभाव उक्तः । तदुक्तम्- (केशाधरादिसंग्रहणे मोदमानापि मानसे । दुःखितेव बहिः कुप्येतत्कुट्टिमम्)
Summary
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Ambika (Parvati), shaking her sprout-like hand in pain, for a moment soothed her lower lip, which had been bitten and then released, with the cool crescent moon on the head of Shulin (Shiva).
सारांश
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अधरों के दंश से उत्पन्न वेदना के कारण कांपते हाथों वाली पार्वती ने शिव के मस्तक पर स्थित शीतल चंद्रमा की कला से अपने होठों की जलन शांत की।
पदच्छेदः
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| दष्टमुक्तम् | दष्ट (√दंश्+क्त)–मुक्त (२.१) | bitten and released |
| अधरोष्ठम् | अधर–ओष्ठ (२.१) | lower lip |
| अम्बिका | अम्बिका (१.१) | Ambika (Parvati) |
| वेदनाविधुतहस्तपल्लवा | वेदना–विधुत (वि√धू+क्त)–हस्त–पल्लव (१.१) | shaking her sprout-like hand in pain |
| शीतलेन | शीतल (३.१) | with the cool |
| निरवापयत् | निरवापयत् (निर्√वप् +णिच् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | soothed |
| क्षणम् | क्षण (२.१) | for a moment |
| मौलिचन्द्रशकलेन | मौलि–चन्द्र–शकल (३.१) | crescent moon on the head |
| शूलिनः | शूलिन् (६.१) | of Shulin (Shiva) |
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| द | ष्ट | मु | क्त | म | ध | रो | ष्ठ | मा | म्बि | का |
| वे | द | ना | वि | धु | त | ह | स्त | प | ल्ल | वा |
| शी | त | ले | न | नि | र | वा | प | य | त्क्ष | णं |
| मौ | लि | च | न्द्र | श | क | ले | न | शू | लि | नः |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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