नवपरिणयलज्जाभूषणां तत्र गौरीं
वदनमपहरन्तीं तत्कृतोत्क्षेपमीशः ।
अपि शयनसखीभ्यो दत्तवाचं कथंचि-
त्प्रमथमुखविकारैर्हासयामास गूढम् ॥
नवपरिणयलज्जाभूषणां तत्र गौरीं
वदनमपहरन्तीं तत्कृतोत्क्षेपमीशः ।
अपि शयनसखीभ्यो दत्तवाचं कथंचि-
त्प्रमथमुखविकारैर्हासयामास गूढम् ॥
वदनमपहरन्तीं तत्कृतोत्क्षेपमीशः ।
अपि शयनसखीभ्यो दत्तवाचं कथंचि-
त्प्रमथमुखविकारैर्हासयामास गूढम् ॥
अन्वयः
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तत्र ईशः नवपरिणयलज्जाभूषणां वदनम् अपहरन्तीं तत्कृतोत्क्षेपम् अपि शयनसखीभ्यः दत्तवाचं गौरीं कथंचित् प्रमथमुखविकारैः गूढम् हासयामास।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
नवेति । तत्र कौतुकागार ईश ईश्वरो नवपरिणयेन नवोद्वाहेन या लज्जा सा भूषणं यस्यास्तामत एव तेनेश्वरेण कृताक्षेपं कृताकर्षणम् । उन्नमितमिति यावत् । वदनमपहरन्तीं साचीकुर्वन्तीम् । अयं लज्जाभावः । अनुभावान्तरमाह-शयनसखीभ्योऽपि शयने सहशायिनीभ्योऽपीत्यर्थः । कथंचित्कृच्छ्रेण दत्तवाचं दतोत्तरां गौरीं प्रमथा भृङ्गिरिटिप्रभृतयो हास्यरसाधिदेवताः पशुपतेः पारिषदाः । यथाह भरतः-`श्रृङ्गारो विष्णुदैवत्यो हास्यः प्रमथदैवतः` इति । `प्रमथाः स्युः पारिषदाः` इत्यमरः । तेषां मुखविकारैर्मुखविकृतचेष्टितैर्गूढप्रकाशं हासयामास । हासाद्युपायैर्लज्जामपाकर्तुं प्रवृत्तं इत्यर्थः । यथाह गोनर्दः-`हासेन मधुना नम्रवचसा लज्जितां प्रियाम् । विलुप्तलज्जां कुर्वित निपुणैश्च सखीजनैः ।` इति
Summary
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There, Lord Shiva secretly made Gauri laugh with the distorted faces of his Pramathas. She was adorned with the shyness of a new bride, turning her face away when he tried to lift it, and was somehow still speaking to her chambermaids.
सारांश
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लज्जावश पार्वती अपना मुख छिपा रही थीं। शिव ने प्रमथगणों की विचित्र आकृतियों और चेष्टाओं के माध्यम से अपनी मौन वधू को मंद-मंद हँसा दिया।
पदच्छेदः
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| नवपरिणयलज्जाभूषणां | नव–परिणय–लज्जा–भूषण (२.१) | her who was adorned with the shyness of a new bride |
| तत्र | तत्र | There |
| गौरीं | गौरी (२.१) | Gauri |
| वदनम् | वदन (२.१) | her face |
| अपहरन्तीं | अपहरन्ती (अप√हृ+शतृ+ङीप्, २.१) | who was turning away |
| तत्कृतोत्क्षेपम् | तत्–कृत (√कृ+क्त)–उत्क्षेप (२.१) | when he tried to lift it |
| ईशः | ईश (१.१) | the Lord (Shiva) |
| अपि | अपि | even |
| शयनसखीभ्यः | शयन–सखी (५.३) | from her chambermaids |
| दत्तवाचम् | दत्त (√दा+क्त)–वाच् (२.१) | who was speaking |
| कथंचित् | कथंचित् | somehow |
| प्रमथमुखविकारैः | प्रमथ–मुख–विकार (३.३) | with the distorted faces of the Pramathas |
| हासयामास | हासयामास (√हस् +णिच् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | made to laugh |
| गूढम् | गूढ (२.१) | secretly |
छन्दः
मालिनी [१५: ननमयय]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| न | व | प | रि | ण | य | ल | ज्जा | भू | ष | णां | त | त्र | गौ | रीं |
| व | द | न | म | प | ह | र | न्तीं | त | त्कृ | तो | त्क्षे | प | मी | शः |
| अ | पि | श | य | न | स | खी | भ्यो | द | त्त | वा | चं | क | थं | चि |
| त्प्र | म | थ | मु | ख | वि | का | रै | र्हा | स | या | मा | स | गू | ढम् |
| न | न | म | य | य | ||||||||||
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