अथ विबुधगणांस्तानिन्दुमौलिर्विसृज्य
क्षितिधरपतिकन्यामाददानः करेण ।
कनककलशरक्शाभक्तिशोभासनाथं
क्षितिविरचितशय्यं कौतुकागारमागात् ॥
अथ विबुधगणांस्तानिन्दुमौलिर्विसृज्य
क्षितिधरपतिकन्यामाददानः करेण ।
कनककलशरक्शाभक्तिशोभासनाथं
क्षितिविरचितशय्यं कौतुकागारमागात् ॥
क्षितिधरपतिकन्यामाददानः करेण ।
कनककलशरक्शाभक्तिशोभासनाथं
क्षितिविरचितशय्यं कौतुकागारमागात् ॥
अन्वयः
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अथ इन्दुमौलिः तान् विबुधगणान् विसृज्य करेण क्षितिधरपतिकन्याम् आददानः कनककलशरक्षाभक्तिशोभासनाथं क्षितिविरचितशय्यं कौतुकागारम् अगात्।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
अथेति । अथेन्दुमौलिरीश्वरस्तान्विबुधगणान्विसृज्य क्षितिधरपतिकन्यां पार्वतीं करेणाददानः कनककलशयुक्तं मङगलार्थमन्तर्निहितहेममयपूर्णकुम्भं भक्तयः पुष्पादिरचनास्तासां शोभया सनाथम् । सहितमित्यर्थः । क्षितिविरचितशय्यं क्षितौ विरचिता स्थण्डिले कल्पिता शय्या तल्पं यस्मिंस्तत्तथोक्तं कौतुकागारमगाच्छय्यागृहं जगाम । अत्राश्वलायनः-`अत ऊर्ध्वमक्षारलवणाशिनावधःशायिनौ ब्रह्मचारिणौ स्याताम्` इति । अथ ऊर्ध्व विवाहादूर्ध्वम् । आ त्रिरात्रादिति शेषः । `त्रिरात्रं द्वादशरात्रं वा ` इति वचनात् । तथा कामशास्त्रेऽपि `अथ परिणयरात्रौ प्रक्रमेणैव किञ्चित्तिसृषु च रजनीषु स्तब्धभावा दुनोति । त्रिदिनमिह न भिन्द्याद्ब्रह्मचर्यं न चास्या हृदयमननुरुध्य स्वेच्छया कर्म कुर्यात्` इति
Summary
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Then, Shiva (the moon-crested one), after dismissing the hosts of gods, took the daughter of the mountain king (Parvati) by the hand and went to the nuptial chamber, which was adorned with decorative patterns around golden pitchers and had a bed prepared on the ground.
सारांश
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तदुपरांत शिव ने देवताओं को विदा किया और पार्वती का हाथ थामकर उस स्वर्ण कलशों से सजे हुए विवाह-कक्ष में प्रवेश किया जहाँ सुंदर शय्या बिछी थी।
पदच्छेदः
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| अथ | अथ | Then |
| विबुधगणान् | विबुध–गण (२.३) | the hosts of gods |
| तान् | तद् (२.३) | them |
| इन्दुमौलिः | इन्दु–मौलि (१.१) | the moon-crested one (Shiva) |
| विसृज्य | विसृज्य (वि√सृज्+ल्यप्) | having dismissed |
| क्षितिधरपतिकन्याम् | क्षितिधर–पति–कन्या (२.१) | the daughter of the king of mountains |
| आददानः | आददान (आ√दा+शानच्, १.१) | taking |
| करेण | कर (३.१) | by the hand |
| कनककलशरक्षाभक्तिशोभासनाथम् | कनक–कलश–रक्षा–भक्ति–शोभा–सनाथ (२.१) | adorned with decorative patterns around golden pitchers |
| क्षितिविरचितशय्यम् | क्षिति–विरचित (वि√रच्+क्त)–शय्य (२.१) | which had a bed prepared on the ground |
| कौतुकागारम् | कौतुक–आगार (२.१) | to the nuptial chamber |
| अगात् | अगात् (√गम् कर्तरि लुङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | went |
छन्दः
मालिनी [१५: ननमयय]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | थ | वि | बु | ध | ग | णां | स्ता | नि | न्दु | मौ | लि | र्वि | सृ | ज्य |
| क्षि | ति | ध | र | प | ति | क | न्या | मा | द | दा | नः | क | रे | ण |
| क | न | क | क | ल | श | र | क्शा | भ | क्ति | शो | भा | स | ना | थं |
| क्षि | ति | वि | र | चि | त | श | य्यं | कौ | तु | का | गा | र | मा | गात् |
| न | न | म | य | य | ||||||||||
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