बभौ च संपर्कमुपेत्य बाला
नवेन दीक्षाविधिसायकेन ।
करेण भानोर्बहुलावसाने
संधुक्ष्यमाणेव शशाङ्कलेखा ॥

अन्वयः AI बाला नवेन दीक्षाविधिसायकेन संपर्कम् उपेत्य, बहुल-अवसाने भानोः करेण संधुक्ष्यमाणा शशाङ्कलेखा इव, बभौ च ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) बभाविति । किंचेति चार्थः । बाला नवेव दीक्षाविधौ विवाहकृत्ये यः सायकस्तेन संपर्कमुपेत्य बहुलावसाने कृष्णपक्षात्यये । शुक्लपक्षादावित्यर्थः । भानोः करेण किरणेन संधुक्ष्यमाणोपचीयमानाः `सलिलमये शशिनि रवेर्दीधितयो मूर्च्छितास्तमो नैशम् । क्षपयन्ती` त्यादिवचनात् । शशाङ्करेखेव बभौ
Summary AI The young maiden, having come into contact with the new ceremonial arrow, shone like a crescent of the moon at the end of the dark fortnight, being kindled by a ray of the sun.
सारांश AI विवाह की नवीन दीक्षा विधि से पार्वती वैसी ही सुशोभित हुईं, जैसे अमावस्या के अंत में सूर्य की पहली किरण के स्पर्श से चन्द्रमा की नई कला चमकती है।
पदच्छेदः AI
बभौबभौ (√भा कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) shone
and
संपर्कम्संपर्क (२.१) contact
उपेत्यउपेत्य (उप√इ+ल्यप्) having come into
बालाबाला (१.१) the young maiden
नवेननव (३.१) with the new
दीक्षाविधिसायकेनदीक्षाविधिसायक (३.१) ceremonial arrow
करेणकर (३.१) by a ray
भानोःभानु (६.१) of the sun
बहुलावसानेबहुलअवसान (७.१) at the end of the dark fortnight
संधुक्ष्यमाणासंधुक्ष्यमाण (सम्√धुक्ष्+कर्मणि+शानच्, १.१) being kindled
इवइव like
शशाङ्कलेखाशशाङ्कलेखा (१.१) a crescent of the moon
छन्दः उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
भौ सं र्क मु पे त्य बा ला
वे दी क्षा वि धि सा के
रे भा नो र्ब हु ला सा ने
सं धु क्ष्य मा णे शा ङ्क ले खा
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