प्रयुक्तपाणिग्रहणं यदन्य-
द्वधूवरं पुष्यति कान्तिमग्र्याम् ।
सान्निध्ययोगादनयोस्तदानीं
किं कथ्यते श्रीरुभयस्य तस्य ॥
प्रयुक्तपाणिग्रहणं यदन्य-
द्वधूवरं पुष्यति कान्तिमग्र्याम् ।
सान्निध्ययोगादनयोस्तदानीं
किं कथ्यते श्रीरुभयस्य तस्य ॥
द्वधूवरं पुष्यति कान्तिमग्र्याम् ।
सान्निध्ययोगादनयोस्तदानीं
किं कथ्यते श्रीरुभयस्य तस्य ॥
अन्वयः
AI
यत् अन्यत् प्रयुक्तपाणिग्रहणम् वधूवरम् अग्र्याम् कान्तिम् पुष्यति, तदानीम् अनयोः सान्निध्ययोगात् तस्य उभयस्य श्रीः किम् कथ्यते?
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
प्रयुक्तेति । यद्यस्मात्कारणात्प्रयुक्तं पाणिग्रहणं यस्य तत्तथोक्तमन्यल्लौकिकम् । वधूश्च वरश्च वधूवरम् । समाहारे द्वन्द्वैकवद्भावः । तदानीं पाणिग्रहणकालेऽनयोरुमाशिवयोः सांनिध्ययोगात्संनिधिभावादग्र्यामुत्तमां कान्तिं शोभां पुष्यति पुष्णाति तस्योभयस्योमामहेश्वररूपस्य मिथुनस्य श्रीः किं कथ्यते । यत्प्रसादादन्यस्य शोभालाभस्तस्य किमु वक्तव्येत्यर्थः । `विवाहसमये गौरीशिवौ वधूवरावनुप्रविशेताम्` इत्यागमः
Summary
AI
If any other bride and groom, having performed the hand-taking ceremony, attain excellent beauty, then what can be said of the splendor of both (the ceremony and the couple) due to the proximity of these two (Shiva and Parvati)?
सारांश
AI
विवाह के समय जब अन्य साधारण जोड़े भी अत्यंत कांतिमान दिखते हैं, तब इन दोनों के सान्निध्य से उत्पन्न उस अलौकिक शोभा का क्या वर्णन किया जाए!
पदच्छेदः
AI
| प्रयुक्तपाणिग्रहणम् | प्रयुक्त (प्र√युज्+क्त)–पाणिग्रहण (१.१) | the performed hand-taking ceremony |
| यत् | यद् (१.१) | which |
| अन्यत् | अन्य (१.१) | other |
| वधूवरम् | वधू–वर (२.१) | bride and groom |
| पुष्यति | पुष्यति (√पुष् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | nourishes with |
| कान्तिम् | कान्ति (२.१) | beauty |
| अग्र्याम् | अग्र्य (२.१) | excellent |
| सान्निध्ययोगात् | सान्निध्य–योग (५.१) | due to the union of proximity |
| अनयोः | इदम् (६.२) | of these two |
| तदानीम् | तदानीम् | then |
| किम् | किम् (१.१) | what |
| कथ्यते | कथ्यते (√कथ भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | can be said |
| श्रीः | श्री (१.१) | of the splendor |
| उभयस्य | उभय (६.१) | of both |
| तस्य | तद् (६.१) | of that |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | यु | क्त | पा | णि | ग्र | ह | णं | य | द | न्य |
| द्व | धू | व | रं | पु | ष्य | ति | का | न्ति | म | ग्र्याम् |
| सा | न्नि | ध्य | यो | गा | द | न | यो | स्त | दा | नीं |
| किं | क | थ्य | ते | श्री | रु | भ | य | स्य | त | स्य |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.