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तासां मुखैरासवगन्धगर्भै-
र्व्याप्तान्तराः सान्द्रकुतूहलानाम् ।
विलोलनेत्रभ्रमरैर्गवाक्षाः
सहस्रपत्राभरणा इवासन् ॥

अन्वयः AI सान्द्र-कुतूहलानाम् तासाम् आसव-गन्ध-गर्भैः विलोल-नेत्र-भ्रमरैः मुखैः व्याप्त-अन्तराः गवाक्षाः सहस्र-पत्र-आभरणाः इव आसन्।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) तासामिति । तदानीं सान्द्रकुतूहलानां तासां स्त्रीणामासवगन्धो गर्भे येषां तैः । विलोलानि नेत्राण्येव भ्रमरा येषु तैर्मुखैर्व्याप्तान्तराश्छन्नावकाशा गवाक्षाः सहस्रपत्त्राभरणा इवासन् । कमलालंकृता इव स्थिता इत्यथः
Summary AI The windows, with their spaces filled by the faces of those intensely curious women, seemed to be adorned with lotuses. Their faces were fragrant with wine, and their restless eyes were like hovering bees.
सारांश AI झरोखों से झांकती उन उत्सुक स्त्रियों के मदिरा की सुगंध वाले मुख और चंचल नेत्रों रूपी भौंरों से वे खिड़कियां ऐसी लग रही थीं जैसे सहस्रों कमलों से सजी हों।
पदच्छेदः AI
तासाम्तद् (६.३) of those women
मुखैःमुख (३.३) by the faces
आसव-गन्ध-गर्भैःआसवगन्धगर्भ (३.३) fragrant with wine
व्याप्त-अन्तराःव्याप्त (वि√आप्+क्त)अन्तर (१.३) with their spaces filled
सान्द्र-कुतूहलानाम्सान्द्रकुतूहल (६.३) of those intensely curious
विलोल-नेत्र-भ्रमरैःविलोलनेत्रभ्रमर (३.३) with restless eyes like bees
गवाक्षाःगवाक्ष (१.३) the windows
सहस्र-पत्र-आभरणाःसहस्रपत्रआभरण (१.३) adorned with lotuses
इवइव seemed
आसन्आसन् (√अस् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) were
छन्दः उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
ता सां मु खै रा न्ध र्भै
र्व्या प्ता न्त राः सा न्द्र कु तू ला नाम्
वि लो ने त्र भ्र रै र्ग वा क्षाः
स्र त्रा णा वा सन्
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