जालान्तरप्रेषितदृष्तिरन्या
प्रस्थानभिन्नां न बबन्ध नीवीम् ।
नाभिप्रविष्टाभरणप्रभेण
हस्तेन तस्थाववलम्ब्य वासः ॥

अन्वयः AI जाल-अन्तर-प्रेषित-दृष्टिः अन्या प्रस्थान-भिन्नाम् नीवीम् न बबन्ध। सा नाभि-प्रविष्ट-आभरण-प्रभेण हस्तेन वासः अवलम्ब्य तस्थौ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) जालान्तरेति । अन्या स्त्री जालान्तरप्रेषितदृष्टिर्गवाक्षमध्यप्रसारितदृष्टिः सती प्रस्थानेन गमनेन भिन्नां त्रुटितां नीवीं वस्त्रग्रन्थिम् । `नीवी परिपणे ग्रन्थौ स्त्रीणां जधनवाससि` । इति विश्वः । न बबन्ध नाबध्नात् किन्तु नाभिं प्रविष्टाभरणानां कङ्कणानां प्रभा यस्य तेन । प्रभैव नाभेरावरणमभूदिति भावः । हस्तेन वासोऽवलम्ब्य धृत्वा तस्थौ
Summary AI Another woman, her gaze fixed through a lattice window, did not tie her girdle-knot which had come loose in her haste. She stood there, holding up her garment with one hand, the radiance of whose ornaments shone upon her navel.
सारांश AI खिड़की की ओर ताकती एक अन्य स्त्री की साड़ी की गाँठ ढीली हो गई, जिसे उसने बांधने के बजाय अपने हाथ से पकड़ लिया; उसकी नाभि के आभूषणों की कांति हाथ पर चमक रही थी।
पदच्छेदः AI
जाल-अन्तर-प्रेषित-दृष्टिःजालअन्तरप्रेषित (प्र√इष्+क्त)दृष्टि (१.१) her gaze fixed through a lattice window
अन्याअन्य (१.१) another woman
प्रस्थान-भिन्नाम्प्रस्थानभिन्न (√भिद्+क्त, २.१) loosened in her haste
not
बबन्धबबन्ध (√बन्ध् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) did tie
नीवीम्नीवी (२.१) her girdle-knot
नाभि-प्रविष्ट-आभरण-प्रभेणनाभिप्रविष्टआभरणप्रभा (३.१) by the one whose ornament's radiance entered her navel
हस्तेनहस्त (३.१) with her hand
तस्थौतस्थौ (√स्था कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) she stood
अवलम्ब्यअवलम्ब्य (अव√लम्ब्+ल्यप्) holding up
वासःवासस् (२.१) her garment
छन्दः इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
जा ला न्त प्रे षि दृ ष्ति न्या
प्र स्था भि न्नां न्ध नी वीम्
ना भि प्र वि ष्टा प्र भे
स्ते स्था म्ब्य वा सः
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