वर्गावुभौ देवमहीधराणां
द्वारे पुरस्योद्घटितापिधाने ।
समीयतुर्दूरविसर्पिघोषौ
भिन्नैकसेतू पयसामिवौघौ ॥

अन्वयः AI दूर-विसर्पि-घोषौ देव-महीधराणाम् उभौ वर्गौ, भिन्न-एक-सेतू पयसाम् ओघौ इव, उद्घाटित-अपिधाने पुरस्य द्वारे समीयतुर।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) वर्गाविति । दूरविसर्पी दूरगामी घोषो ययोस्तौ देवाश्च महीधराश्च तेषां देवमहीधराणामुभौ वर्गावुद्घटितापिधानेऽपनीतकवाटे पुरस्य द्वारे भिन्ने दीर्ण एकसेतुः याभ्यां तौ भिन्नैकसेतू पयसामोघो प्रवाहाविव समीयतुः संगतौ
Summary AI The two groups, that of the gods and that of the mountains' retinue, their clamor spreading far, met at the city gate whose doors were opened, just like two torrents of water meeting after breaking a single dam.
सारांश AI नगर के द्वार पर देवताओं और पर्वतों के समूह जब मिले, तो उनका सम्मिलित कोलाहल सेतु टूटने पर मिलने वाले जल के दो प्रवाहों के समान अत्यंत व्यापक था।
पदच्छेदः AI
वर्गौवर्ग (१.२) the two groups
उभौउभ (१.२) both
देव-महीधराणाम्देवमहीधर (६.३) of the gods and the mountains
द्वारेद्वार (७.१) at the gate
पुरस्यपुर (६.१) of the city
उद्घाटित-अपिधानेउद्घाटित (उद्√घट्+क्त)अपिधान (७.१) whose doors were opened
समीयतुरसमीयतुः (सम्√इ कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. द्वि.) met
दूर-विसर्पि-घोषौदूरविसर्पिन्घोष (१.२) whose clamor spread far
भिन्न-एक-सेतूभिन्न (√भिद्+क्त)एकसेतु (१.२) having broken a single dam
पयसाम्पयस् (६.३) of water
इवइव like
ओघौओघ (१.२) two torrents
छन्दः उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
र्गा वु भौ दे ही रा णां
द्वा रे पु स्यो द्घ टि ता पि धा ने
मी तु र्दू वि र्पि घो षौ
भि न्नै से तू सा मि वौ घौ
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