अन्वयः
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खे खेल-गामी, स-शब्द-चामीकर-किङ्किणीकः वाहः, तट-अभिघातात् इव लग्न-पङ्के प्रोत-घने विषाणे मुहुः धुन्वन्, तम् उवाह।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
ख इति । ख आकाशे खेलं सुन्दरं गच्छतीति खेलगामी । सशब्दाः शब्दायमानाश्चामीकरकिंकिण्यः काञ्चनक्षुद्रघण्टिका यस्य स तथोक्तः । `किङ्किणी क्षुद्रधण्टिका` इत्यमरः । `नद्युतश्च` इति कप् । वाह्यतेऽनेनेति वाहो वृषभः । करणे घञ् । प्रोतघने स्यूतमेघे अत एव तटाभिघाताद्रोधोभेदाल्लग्नपङ्के श्लिष्टकर्दमे इव स्थिते विषाणे श्रृङ्गे मुहुर्धुन्वंस्तं हरमुवाह वहति स्म
Summary
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In the sky, his playfully-moving mount (Nandi), adorned with jingling golden bells, carried him. It repeatedly shook its two horns, on which clouds were impaled, as if to shake off mud stuck from striking a riverbank.
सारांश
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शिव का बैल नंदी, जिसके गले में घंटियाँ बज रही थीं, आकाश में ऐसे चल रहा था मानो उसके सींग बादलों को चीर रहे हों और वह कीचड़ से निकल रहा हो।
पदच्छेदः
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| खे | ख (७.१) | in the sky |
| खेल-गामी | खेल–गामिन् (१.१) | playfully-moving |
| तम् | तद् (२.१) | him |
| उवाह | उवाह (√वह् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | carried |
| वाहः | वाह (१.१) | the mount (Nandi) |
| स-शब्द-चामीकर-किङ्किणीकः | स–शब्द–चामीकर–किङ्किणी (१.१) | with jingling golden bells |
| तट-अभिघातात् | तट–अभिघात (५.१) | from striking a bank |
| इव | इव | as if |
| लग्न-पङ्के | लग्न (√लग्+क्त)–पङ्क (७.२) | with mud stuck on them |
| धुन्वन् | धुन्वन् (√धू+शतृ, १.१) | shaking |
| मुहुः | मुहुः | repeatedly |
| प्रोत-घने | प्रोत (प्र√उ+क्त)–घन (७.२) | with clouds impaled |
| विषाणे | विषाण (७.२) | his two horns |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| खे | खे | ल | गा | मी | त | मु | वा | ह | वा | हः |
| स | श | ब्द | चा | मी | क | र | कि | ङ्कि | णी | कः |
| त | टा | भि | घा | ता | दि | व | ल | ग्न | प | ङ्के |
| धु | न्व | न्मु | हुः | प्रो | त | घ | ने | वि | षा | णे |
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