अन्वयः
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तदानीम् मूर्ते गङ्गा-यमुने च स-चामरे (सत्यौ) देवम् असेविषाताम्। समुद्रगा-रूप-विपर्यये अपि (ते) स-हंस-पाते इव लक्ष्यमाणे (आस्ताम्)।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
मूर्ते इति । गङ्गा च यमुना च गङ्गायमुने मूर्ते विग्रहधारिण्यौ सचामरे चामरसहिते सत्यौ । अत एव समुद्रगा नदी तस्या रुपं स्वरुपं तस्य विपर्ययेऽप्यभावेऽपि सह हंसपातेन हंसचारेण वर्तेत इति सहंसपाते इव `तेन सहेति तुल्ययोगे` (अष्टाध्यायी २.२.२८ ) इति बहुव्रीहिः । `वोपसर्जनस्य` (अष्टाध्यायी ६.३.८२ ) इति सभावः । लक्ष्यमाणे दृश्यमाने सत्यौ तदानीं विवाहसमये देवमसेविषातामभजताम् । सेवतेर्लङ् । गङ्गायमुने चामरग्राहिण्यौ देवमुपतस्थतुरित्यर्थः
Summary
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At that time, the rivers Ganga and Yamuna, in personified forms, served the god by waving whisks. Even though they had abandoned their river forms, the movement of the white whisks made them appear as if they were still accompanied by flights of swans.
सारांश
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साक्षात् रूप धारण किए हुए गंगा और यमुना चँवर डुलाकर शिव की सेवा करने लगीं। मनुष्य रूप में होने पर भी वे अपने हंसों और लहरों के चिन्हों से पहचानी जा रही थीं।
पदच्छेदः
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| मूर्ते | मूर्त (१.२) | personified |
| च | च | and |
| गङ्गा-यमुने | गङ्गायमुना (१.२) | Ganga and Yamuna |
| तदानीम् | तदानीम् | at that time |
| स-चामरे | सचामर (१.२) | holding whisks |
| देवम् | देव (२.१) | the god |
| असेविषाताम् | असेविषाताम् (√सेव् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. द्वि.) | served |
| समुद्रगा-रूप-विपर्यये | समुद्रगा–रूप–विपर्यय (७.१) | despite the change from their form as rivers |
| अपि | अपि | even |
| स-हंस-पाते | सहंसपात (१.२) | appearing as if with the flight of swans |
| इव | इव | as if |
| लक्ष्यमाणे | लक्ष्यमाण (√लक्ष्+यक्+शानच्, १.२) | being seen |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मू | र्ते | च | ग | ङ्गा | य | मु | ने | त | दा | नीं |
| स | चा | म | रे | दे | व | म | से | वि | षा | ताम् |
| स | मु | द्र | गा | रू | प | वि | प | र्य | ये | ऽपि |
| स | हं | स | पा | ते | इ | व | ल | क्ष्य | मा | णे |
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