Loading data... On slow networks this could take a few minutes.
100%

स गोपतिं नन्दिभुजावलम्बी
शार्दूलचर्मान्तरितोरुपृष्ठम् ।
तद्भक्तिसंक्षिप्तबृहत्प्रमाण-
मारुह्य कैलासमिव प्रतस्थे ॥

अन्वयः AI नन्दि-भुज-अवलम्बी सः, शार्दूल-चर्म-अन्तरित-उरु-पृष्ठम्, तत्-भक्ति-संक्षिप्त-बृहत्-प्रमाणम् गोपतिम् आरुह्य, कैलासम् इव प्रतस्थे।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) स इति । स देवो नन्दिभुजावल्बी नन्दिकेश्वरभुजावलम्बनः सन् । शार्दूलचर्मणा व्याघ्रचर्मणान्तरितमाच्छादितमुरु विशालं पृष्ठं यस्य तं तथोक्तम् `शार्दूलद्वीपिनौ व्याघ्र` इत्यमरः (अमरकोशः २.५.२ ) । तस्मिन्देवे भक्त्या संक्षिप्तं संकोचितं बृहत्प्रमाणं यस्य तं गोपतिं वृषभं कैलासमिवारुह्य प्रतस्थे चचाल
Summary AI Leaning on Nandi's arm, Shiva mounted his bull, whose broad back was covered with a tiger skin and whose massive form had been condensed out of devotion. Mounting him, who was like a moving Kailasa, Shiva set out.
सारांश AI नंदी के कंधे का सहारा लेकर शिव व्याघ्रचर्म से ढकी उसकी पीठ पर सवार हुए। वह वृषभ भक्तिवश संकुचित होकर साक्षात कैलाश जैसा लग रहा था।
पदच्छेदः AI
सःतद् (१.१) he
गोपतिम्गोपति (२.१) the lord of bulls (Nandi)
नन्दि-भुज-अवलम्बीनन्दिभुजअवलम्बिन् (१.१) leaning on Nandi's arm
शार्दूल-चर्म-अन्तरित-उरु-पृष्ठम्शार्दूलचर्मअन्तरितउरुपृष्ठ (२.१) whose broad back was covered with a tiger skin
तत्-भक्ति-संक्षिप्त-बृहत्-प्रमाणम्तत्भक्तिसंक्षिप्तबृहत्प्रमाण (२.१) whose great size was contracted due to his devotion
आरुह्यआरुह्य (आ√रुह्+ल्यप्) having mounted
कैलासम्कैलास (२.१) Kailasa
इवइव as if
प्रतस्थेप्रतस्थे (प्र√स्था कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) set out
छन्दः उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
गो तिं न्दि भु जा म्बी
शा र्दू र्मा न्त रि तो रु पृ ष्ठम्
द्भ क्ति सं क्षि प्त बृ त्प्र मा
मा रु ह्य कै ला मि प्र स्थे
About

Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.