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क्षीरोदवेलेव सफेनपुञ्जा
पर्याप्तचन्द्रेव शरत्त्रियामा ।
नवं नवक्षौमनिवासिनी सा
भूयो बभौ दर्पणमादधाना ॥

अन्वयः AI नवम् नव-क्षौम-निवासिनी, दर्पणम् आदधाना सा, स-फेन-पुञ्जा क्षीरोद-वेला इव, पर्याप्त-चन्द्रा शरत्-त्रियामा इव भूयः बभौ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) क्षीरोदेति । नवं नूतनं क्षौमं दुकूलं निवस्त आच्छादयतीति नवक्षौमनिवासिनी । वस्तेराच्छादनार्थाण्णिनिः । तथा नवं दर्पणमादधाना बिभ्रती सा गौरी सफेनपुञ्जा सडिण्डीरपङ्क्तिः । क्षीरमुदकं यस्य स क्षीरोदः क्षीरसमुद्रः । `उदकस्योदः संज्ञायाम्` (अष्टाध्यायी ६.३.५७ ) इत्युदादेशः । तस्य वेला तीरभूमिरिव । `वेला काले च जलधेस्तीरनीरविकारयोः` । इति विश्वः । पर्याप्तचन्द्रा पूर्णचन्द्रा शरतत्त्रियामा शरद्रात्रिरिव भूयो भूयिष्ठं बभौ चकासे
Summary AI Dressed in a new silk garment and holding a mirror, she shone even more brightly. She looked like the shore of the milk ocean with its masses of foam, and like an autumn night graced by a full moon.
सारांश AI श्वेत रेशमी वस्त्र धारण कर और हाथ में दर्पण लिए पार्वती क्षीरसागर की तटरेखा और शरद ऋतु की चांदनी रात जैसी कांतिवान प्रतीत हुईं।
पदच्छेदः AI
क्षीरोद-वेलाक्षीरोदवेला (१.१) the shore of the milk ocean
इवइव like
स-फेन-पुञ्जाफेनपुञ्ज (१.१) with masses of foam
पर्याप्त-चन्द्रापर्याप्तचन्द्र (१.१) with a full moon
इवइव like
शरत्-त्रियामाशरद्त्रियामा (१.१) an autumn night
नवम्नव (२.१) new
नव-क्षौम-निवासिनीनवक्षौमनिवासिन् (१.१) she who was wearing a new silk garment
सातद् (१.१) she
भूयःभूयस् greatly
बभौबभौ (√भा कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) shone
दर्पणम्दर्पण (२.१) a mirror
आदधानाआदधान (आ√धा+शानच्, १.१) holding
छन्दः उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
क्षी रो वे ले फे पु ञ्जा
र्या प्त न्द्रे त्त्रि या मा
वं क्षौ नि वा सि नी सा
भू यो भौ र्प मा धा ना
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