अन्वयः
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यः प्रथमः मनोरथः उमा-स्तन-उद्भेदम् अनुप्रवृद्धः बभूव, तम् एव मनोरथम् मेना कथंचित् दुहितुः विवाह-दीक्षा-तिलकम् चकार।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
उमेति । उमायाः स्तनेद्भेदमनु । स्तनोदयमारभ्येत्यर्थः । प्रवृद्धो वृद्धिं गतः । प्रागेवोत्पन्न इति भावः । यो मनोरथो वाञ्छा । `वाञ्छा लिप्सा मनोरथः` इत्यमरः (अमरकोशः १.७.२९ ) । प्रथमं मनोरथान्तरात्प्राक् । अयमेव प्रथमो मनोरथ इत्यर्थः, बभूव, मेनादुहितुस्तमेव मनोरथभूतमेव । तद्विषये तत्तोपचारः । विवाहदीक्षायां विवाहकृत्ये तिलकं कथंचित्कृच्छ्रेण चकार । आनन्दवाष्पान्धतयेति शेषः । विवाहानन्तरभावित्वादन्येषामयमेव प्रथमो मनोरथ इति भावः । युग्मकम्
Summary
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The very first wish that had grown in Menā's heart along with the budding of her daughter Uma's youth—that wish she now, with deep emotion, transformed into the auspicious tilaka mark for the marriage ceremony on her daughter's forehead.
सारांश
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मेना ने पार्वती के मस्तक पर विवाह का मंगल तिलक लगाया, जो मानो उनके यौवन के साथ बढ़ती हुई उनकी प्रथम अभिलाषा का ही साकार रूप था।
पदच्छेदः
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| उमा-स्तन-उद्भेदम् | उमा–स्तन–उद्भेद (२.१) | the first appearance of Uma's breasts |
| अनुप्रवृद्धः | अनुप्रवृद्ध (अनु+प्र√वृध्+क्त, १.१) | which grew along with |
| मनोरथः | मनोरथ (१.१) | the desire |
| यः | यद् (१.१) | which |
| प्रथमः | प्रथम (१.१) | first |
| बभूव | बभूव (√भू कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | was |
| तम् | तद् (२.१) | that |
| एव | एव | very |
| मेना | मेना (१.१) | Mena |
| दुहितुः | दुहितृ (६.१) | of her daughter |
| कथंचित् | कथंचित् | somehow |
| विवाह-दीक्षा-तिलकम् | विवाह–दीक्षा–तिलक (२.१) | as the auspicious mark of the marriage ceremony |
| चकार | चकार (√कृ कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | made |
छन्दः
उपेन्द्रवज्रा [११: जतजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| उ | मा | स्त | नो | द्भे | द | म | नु | प्र | वृ | द्धो |
| म | नो | र | थो | यः | प्र | थ | मो | ब | भू | व |
| त | मे | व | मे | ना | दु | हि | तुः | क | थं | चि |
| द्वि | वा | ह | दी | क्षा | ति | ल | कं | च | का | र |
| ज | त | ज | ग | ग | ||||||
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