पशुपतिरपि तान्यहानि कृच्छ्रा-
दगमयदद्रिसुतासमागमोत्कः ।
कमपरमवशं न विप्रकुर्यु-
र्विभुमपि तं यदमी स्पृशन्ति भावाः ॥
पशुपतिरपि तान्यहानि कृच्छ्रा-
दगमयदद्रिसुतासमागमोत्कः ।
कमपरमवशं न विप्रकुर्यु-
र्विभुमपि तं यदमी स्पृशन्ति भावाः ॥
दगमयदद्रिसुतासमागमोत्कः ।
कमपरमवशं न विप्रकुर्यु-
र्विभुमपि तं यदमी स्पृशन्ति भावाः ॥
अन्वयः
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अद्रिसुता-समागमोत्कः पशुपतिः अपि तानि अहानि कृच्छ्रात् अगमयत् । यत् अमी भावाः तम् विभुम् अपि स्पृशन्ति, (तत्) अपरम् कम् अवशम् न विप्रकुर्युः?
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
पशुपतिरिति । उत्कं मनो यस्य स उत्कः । `उत्क उन्मनाः` (अष्टाध्यायी ५.२.८० ) इति निपातः । अद्रिसुतासमागमोत्कः पार्वतीपरिणयोत्सुकः पशुपतिरपि तानि । त्रीणीति शेषः । अहानि कृच्छ्रादगमयदयापयत् । कविराह-अमी भावा औत्सुक्यादयः संचारिणोऽवशमिन्द्रियपरतन्त्रमपरं पृथग्जनं कं न विप्रकुर्युर्न विकारं नयेयुः । यद्यस्माद्विभुं समर्थम् । जितेन्द्रियमिति यावत् । तं स्मरहरमपि स्पृशन्ति । विकुर्वन्तीत्यर्थः । अत्र विभुविकारसमर्थनादर्थादितरजनविकारः । कैमुतिकन्यायायादापततीत्यर्थापत्तिरलंकारः । तथा च सूत्रम्- `दण्डापूपिकयार्थान्तरपतनमर्थापत्तिः` इति । अर्थान्तरन्यास इति । अर्थान्तरन्यास इति केचित्, तदुपेक्षणीयम् । युक्तिस्तु विस्तरभयान्नोच्यते । पुष्पिताग्रावृत्तम् `-अयुजि नयुगरेफतो यकारो युजि च नजौ जरगाश्च पुष्पिताग्रा` । इति लक्षणात्
Summary
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Even Pashupati (Shiva), eager for union with the mountain's daughter, passed those days with difficulty. Since these emotions affect even him, the all-powerful one, what other helpless person would they not disturb?
सारांश
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भगवान शिव ने भी पार्वती से मिलन की उत्कंठा में वे दिन बड़ी कठिनाई से बिताए। जब साक्षात् ईश्वर भी प्रेम भाव से विचलित हो जाते हैं, तब भला अन्य कौन विवश नहीं होगा?
पदच्छेदः
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| पशुपतिः | पशु–पति (१.१) | Pashupati (Shiva) |
| अपि | अपि | even |
| तानि | तद् (२.३) | those |
| अहानि | अहन् (२.३) | days |
| कृच्छ्रात् | कृच्छ्र (५.१) | with difficulty |
| अगमयत् | अगमयत् (√गम् +णिच् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | passed |
| अद्रिसुतासमागमोत्कः | अद्रि–सुता–समागमोत्क (१.१) | eager for union with the mountain's daughter |
| कम् | किम् (२.१) | what |
| अपरम् | अपर (२.१) | other |
| अवशम् | अवश (२.१) | helpless person |
| न | न | not |
| विप्रकुर्युः | विप्रकुर्युः (वि+प्र√कृ कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | would disturb |
| विभुम् | विभु (२.१) | the all-powerful one |
| अपि | अपि | even |
| तम् | तद् (२.१) | him |
| यत् | यत् | since |
| अमी | अदस् (१.३) | these |
| स्पृशन्ति | स्पृशन्ति (√स्पृश् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | affect |
| भावाः | भाव (१.३) | emotions |
छन्दः
पुष्पिताग्रा []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प | शु | प | ति | र | पि | ता | न्य | हा | नि | कृ | च्छ्रा | |
| द | ग | म | य | द | द्रि | सु | ता | स | मा | ग | मो | त्कः |
| क | म | प | र | म | व | शं | न | वि | प्र | कु | र्यु | |
| र्वि | भु | म | पि | तं | य | द | मी | स्पृ | श | न्ति | भा | वाः |
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