अन्वयः
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वत्से, एहि। (त्वम्) विश्व-आत्मने भिक्षा परिकल्पिता असि। मुनयः अर्थिनः (सन्ति)। मया गृहमेधि-फलम् प्राप्तम्।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
एहीति । हे वत्से पुत्रि ! एह्यागच्छ । त्वं विश्वात्मने शिवाय भिक्षा परिकल्पितासि निश्चितासि । `रत्नादिस्तम्बपर्यन्तं सर्वं भिक्षा तपस्विनः` । इति वचनादिति भावः । अर्थिनो याचितारो मुनयः । मया गृहमेधिनो गृहस्थस्य फलं प्राप्तम् । इह परत्र च तारकत्वात्पात्रे कन्यादानं गार्हस्थ्यस्य फलमित्यर्थः
Summary
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(Himalaya said,) "Come, my child. You are designated as sacred alms for the Soul of the Universe. These sages are the supplicants, and through this act, the true fruit of my life as a householder has been obtained by me."
सारांश
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हिमालय ने कहा—पुत्री आओ, तुम विश्वात्मा शिव के लिए भिक्षा स्वरूप हो। याचक स्वयं मुनिगण हैं और आज मुझे गृहस्थ जीवन का फल मिल गया है।
पदच्छेदः
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| एहि | एहि (√इ कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | Come |
| विश्वात्मने | विश्व–आत्मन् (४.१) | for the Soul of the Universe |
| वत्से | वत्सा (८.१) | O child |
| भिक्षा | भिक्षा (१.१) | as alms |
| असि | असि (√अस् कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you are |
| परिकल्पिता | परिकल्पित (परि√कॢप्+णिच्+क्त, १.१) | designated |
| अर्थिनः | अर्थिन् (१.३) | The supplicants |
| मुनयः | मुनि (१.३) | are the sages |
| प्राप्तम् | प्राप्त (प्र√आप्+क्त, १.१) | has been obtained |
| गृहमेधिफलम् | गृहमेधिन्–फल (१.१) | the fruit of being a householder |
| मया | अस्मद् (३.१) | by me |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ए | हि | वि | श्वा | त्म | ने | व | त्से |
| भि | क्षा | सि | प | रि | क | ल्पि | ता |
| अ | र्थि | नो | मु | न | यः | प्रा | प्तं |
| गृ | ह | मे | धि | फ | लं | म | या |
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