अन्वयः
AI
द्विजोत्तमाः, (अहम्) आत्मानं द्वयेन एव पूतम् अवैमि - मूर्ध्नि गङ्गाप्रपातेन, च वः धौतपादाम्भसा ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
अवैमिति । हे द्विजोत्तमाः ! आत्मानं मां द्वयेनैव पूतं शुद्धमवैम्येव गच्छामि । केन द्वयेन । मूर्ध्नि गङ्गाप्रपातेन मन्दाकिनीपातेन वो युष्माकं धौतयोः क्षालितयोः पादयोरम्भसा च । गङ्गाजलवत्पादाम्भसः पावनत्वमित्यौपम्यं गम्यते । तच्च `प्रस्तुताप्रास्तुतयोः` इति दीपकालंकारः । `प्रियः प्रियतराख्यानम्` इति लक्षणात्प्रियोऽलंकार इति केचित्
Summary
AI
"O best of the twice-born, I consider myself purified by two things alone: by the descent of the Ganga on my peaks, and by the water that has washed your feet."
सारांश
AI
हे श्रेष्ठ मुनियों! मैं दो कारणों से स्वयं को परम पवित्र मानता हूँ—एक मस्तक पर गंगा के गिरने से और दूसरा आपके चरणों के प्रक्षालन जल से।
पदच्छेदः
AI
| अवैमि | अवैमि (अव√इ कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. एक.) | I consider |
| पूतम् | पूत (√पू+क्त, २.१) | purified |
| आत्मानं | आत्मन् (२.१) | myself |
| द्वयेन | द्वय (३.१) | by two things |
| एव | एव | alone |
| द्विजोत्तमाः | द्विज–उत्तम (८.३) | O best of the twice-born |
| मूर्ध्नि | मूर्धन् (७.१) | on my head |
| गङ्गाप्रपातेन | गङ्गा–प्रपात (३.१) | by the fall of the Ganga |
| धौतपादाम्भसा | धौत (√धाव्+क्त)–पाद–अम्भस् (३.१) | by the water that has washed your feet |
| च | च | and |
| वः | युष्मद् (६.३) | your |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | वै | मि | पू | त | मा | त्मा | नं |
| द्व | ये | नै | व | द्वि | जो | त्त | माः |
| मू | र्ध्नि | ग | ङ्गा | प्र | पा | ते | न |
| धौ | त | पा | दा | म्भ | सा | च | वः |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.