अन्वयः
AI
भवदनुग्रहात् आत्मानं मूढं बुद्धम् इव, अयसं हैमीभूतम् इव, भूमेः दिवम् आरूढम् इव मन्ये ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
मूढमिति । भवदनुग्रहादात्मानं मां मूढं बुद्धिं विनाकृतं बुद्धमिव मूढो भूत्वा यो बुद्धवांस्तमिव । कर्तरि क्तः । आयसमयोविकारं हैमीभूतम् । आयसत्वं विहाय सौवर्णत्वं प्राप्तमिवेत्यर्थः । भूमेर्भूलोकाद्दिवं स्वर्गमारुढमिव मन्ये । ज्ञानरूपस्थानान्यद्य मे परमुत्कृष्यन्त इति भावः
Summary
AI
"By your grace, I consider myself like an ignorant person who has become enlightened, like iron that has turned into gold, or like one who has ascended from earth to heaven."
सारांश
AI
आपकी कृपा से मैं अपने अज्ञानी स्वरूप को ज्ञानी के समान, लोहे को स्वर्ण में बदला हुआ और स्वयं को पृथ्वी से स्वर्ग पहुँचा हुआ मान रहा हूँ।
पदच्छेदः
AI
| मूढं | मूढ (√मुह्+क्त, २.१) | an ignorant person |
| बुद्धम् | बुद्ध (√बुध्+क्त, २.१) | become enlightened |
| इव | इव | like |
| आत्मानं | आत्मन् (२.१) | myself |
| हैमीभूतम् | हैमीभूत (२.१) | turned into gold |
| इव | इव | like |
| अयसम् | अयस् (२.१) | iron |
| भूमेः | भूमि (५.१) | from the earth |
| दिवम् | दिव् (२.१) | to heaven |
| इव | इव | as if |
| आरूढं | आरूढ (आ√रुह्+क्त, २.१) | ascended |
| मन्ये | मन्ये (√मन् कर्तरि लट् (आत्मने.) उ.पु. एक.) | I consider |
| भवदनुग्रहात् | भवत्–अनुग्रह (५.१) | by your grace |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मू | ढं | बु | द्ध | मि | वा | त्मा | नं |
| है | मी | भू | त | मि | वा | य | सम् |
| भू | मे | र्दि | व | मि | वा | रू | ढं |
| म | न्ये | भ | व | द | नु | ग्र | हात् |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.