अन्वयः
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(ते) दिङ्नागमदगन्धिषु तीरमन्दारकुसुमोत्किरवीचिषु आकाशगङ्गास्रोतस्सु आप्लुताः (आसन्) ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
आप्लुता इति । उत्किरन्ति विक्षिपन्तीत्युत्किराः । `इगुपधे-` त्यादिना कप्रत्ययः । तीरे ये मन्दाराः कल्पवृक्षास्तेषां कुसुमानामुत्किरा वीचयस्तरङ्गा येषां तेषु दिङ्नागानां दिग्गजानां मदगन्धो येष्विति तथोक्तेषु व्योमगङ्गाप्रवाहेष्वाकाशगङ्गास्रोतःस्वाप्लुताः स्नाताः ।
Summary
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(They were) bathed in the streams of the celestial Ganga, whose waters were fragrant with the ichor of the elephants of the quarters, and whose waves scattered the Mandara flowers from its banks.
सारांश
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वे ऋषि आकाशगंगा की उन धाराओं में स्नान करके आए थे जिनकी लहरों पर मंदार के पुष्प तैर रहे थे और जो दिग्गज हाथियों के मद की सुगंध से महक रही थीं।
पदच्छेदः
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| आप्लुताः | आप्लुत (आ√प्लु+क्त, १.३) | bathed |
| तीरमन्दारकुसुमोत्किरवीचिषु | तीर–मन्दार–कुसुम–उत्किर–वीचि (७.३) | in the waves that scattered Mandara flowers from the banks |
| आकाशगङ्गास्रोतस्सु | आकाश–गङ्गा–स्रोतस् (७.३) | in the streams of the celestial Ganga |
| दिङ्नागमदगन्धिषु | दिङ्–नाग–मद–गन्धिन् (७.३) | which were fragrant with the ichor of the elephants of the quarters |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| आ | प्लु | ता | स्ती | र | म | न्दा | र |
| कु | सु | मो | त्कि | र | वी | चि | षु |
| आ | का | श | ग | ङ्गा | स्रो | त | स्सु |
| दि | ङ्ना | ग | म | द | ग | न्धि | षु |
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