सोऽहं तृष्णातुरैर्वृष्टिं विद्युत्वानिव चातकैः ।
अरिविप्रकृतैर्देवैः प्रसूतिं प्रति याचितः ॥

अन्वयः AI सः अहम् अरि-विप्रकृतैः देवैः, तृष्णा-आतुरैः चातकैः विद्युत्वान् वृष्टिम् इव, प्रसूतिम् प्रति याचितः (अस्मि) ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) सोऽहमिति । स परार्थवृत्तिरहं तृष्णातुरैश्चातकैर्वृष्टिं विद्युत्वान्मेघ इवारिविप्रकृतैः शत्रुपीडितैर्देवैः प्रसूतिं पुत्रोत्पादनं प्रति याचितः । याचतेर्दुहादित्वादप्रधाने कर्मणि क्तः
Summary AI I, that very person, have been requested for an offspring by the gods who are harassed by their enemies, just as a cloud is beseeched for rain by Chataka birds afflicted with thirst.
सारांश AI जैसे प्यासे चातक बादलों से वर्षा माँगते हैं, वैसे ही शत्रुओं से प्रताड़ित देवताओं ने मुझसे सन्तान प्राप्ति के लिए प्रार्थना की है।
पदच्छेदः AI
सःतद् (१.१) That
अहम्अस्मद् (१.१) I
तृष्णातुरैःतृष्णाआतुर–तृष्णातुर (३.३) by the ones afflicted with thirst
वृष्टिम्वृष्टि (२.१) for rain
विद्युत्वान्विद्युत्वत् (१.१) a cloud with lightning
इवइव like
चातकैःचातक (३.३) by the Chataka birds
अरिविप्रकृतैःअरिविप्रकृत (वि+प्र√कृ+क्त)–अरिविप्रकृत (३.३) by those harassed by enemies
देवैःदेव (३.३) by the gods
प्रसूतिम्प्रसूति (२.१) for an offspring
प्रतिप्रति for
याचितःयाचित (√याच्+क्त, १.१) have been requested
छन्दः अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
सो ऽहं तृ ष्णा तु रै र्वृ ष्टिं
वि द्यु त्वा नि चा कैः
रि वि प्र कृ तै र्दे वैः
प्र सू तिं प्र ति या चि तः
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