अन्वयः
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(त्वम्) यस्य चेतसि वर्तेथाः, सः तावत् कृतिनाम् वरः । यः तव चेतसि वर्तते, सः ब्रह्मयोनिः (अस्ति इति) किम् पुनः (वक्तव्यम्)?
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
यस्येति । यस्य जनस्य चेतसि वर्तेथाः, येन स्मर्यस इत्यर्थः । स तावत्स एव कृतिनां कृतकृत्यानां वरः श्रेष्ठः । ब्रह्मणो वेधसो वा योनेः कारणस्य । यद्वा वेदप्रमाणकस्य । तव चेतसि यो वर्तते । त्वया स्मर्यत इत्यर्थः । किं पुनः । स कृतिनां वर इति किमु वक्तव्यमित्यर्थः
Summary
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He in whose mind you might dwell is indeed the best among the fortunate. What more, then, can be said of Brahma, who himself dwells in your mind?
सारांश
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जिसके हृदय में आप निवास करते हैं वह धन्य है, फिर उनका तो कहना ही क्या जिन्हें स्वयं आपने अपने हृदय में स्थान देकर स्मरण किया है।
पदच्छेदः
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| यस्य | यद् (६.१) | of whom |
| चेतसि | चेतस् (७.१) | in the mind |
| वर्तेथाः | वर्तेथाः (√वृत् कर्तरि विधिलिङ् (आत्मने.) म.पु. एक.) | you might exist |
| सः | तद् (१.१) | he |
| तावत् | तावत् | indeed |
| कृतिनाम् | कृतिन् (६.३) | of the fortunate ones |
| वरः | वर (१.१) | the best |
| किम् | किम् | what |
| पुनः | पुनर् | moreover |
| ब्रह्मयोनेः | ब्रह्मयोनि (६.१) | of Brahma |
| यः | यद् (१.१) | who |
| तव | युष्मद् (६.१) | your |
| चेतसि | चेतस् (७.१) | in the mind |
| वर्तते | वर्तते (√वृत् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | exists |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | स्य | चे | त | सि | व | र्ते | थाः |
| स | ता | व | त्कृ | ति | नां | व | रः |
| किं | पु | न | र्ब्र | ह्म | यो | ने | र्य |
| स्त | व | चे | त | सि | व | र्त | ते |
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