अन्वयः
AI
यत् जगताम् अध्यक्षेण त्वया वयम् आत्मनः मनोरथस्य अविषयम् मनः-विषयम् आरोपिताः ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
यदिति । यद्यस्मात्कारणाज्जगतामध्यक्षेणाधिपेन त्वया वयं मनोरथस्याभिलाषस्याविषयमगोचरमात्मनः स्वस्य मनोविषयं मनोदेशमारोपिताः प्रापिताः । तस्माद्विपक्वं फलमिति पूर्वेण संबन्धः । `सकलजगदन्वेष्टव्यस्य भगवतोऽपि वयमन्वेष्या भवाम; इति परमोत्कृष्टा वयमिति भावः
Summary
AI
Because we have been raised by you, the overseer of the worlds, to a state that is the object of your mind, a state that was beyond the scope of our own wishful thinking.
सारांश
AI
हे स्वामी, आपने हमें अपने ध्यान का विषय बनाया, जो हमारी इच्छाओं और कल्पनाओं से भी परे था।
पदच्छेदः
AI
| यत् | यद् | Because |
| अध्यक्षेण | अध्यक्ष (३.१) | by the overseer |
| जगताम् | जगत् (६.३) | of the worlds |
| वयम् | अस्मद् (१.३) | we |
| आरोपिताः | आरोपित (आ√रुह्+णिच्+क्त, १.३) | have been raised |
| त्वया | युष्मद् (३.१) | by you |
| मनोरथस्य | मनोरथ (६.१) | of our wishful thinking |
| अविषयम् | अ–विषय–अविषय (२.१) | to a state beyond the scope |
| मनोविषयम् | मनस्–विषय–मनोविषय (२.१) | the object of your mind |
| आत्मनः | आत्मन् (६.१) | your own |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | द | ध्य | क्षे | ण | ज | ग | तां |
| व | य | मा | रो | पि | ता | स्त्व | या |
| म | नो | र | थ | स्या | वि | ष | यं |
| म | नो | वि | ष | य | मा | त्म | नः |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.