तदङ्गसंसर्गमवाप्य कल्पते
ध्रुवं चिताभस्मरजो विशुद्धये ।
तथा हि नृत्याभिनयक्रियाच्युतं
विलिप्यते मौलिभिरम्बरौकसां ॥
तदङ्गसंसर्गमवाप्य कल्पते
ध्रुवं चिताभस्मरजो विशुद्धये ।
तथा हि नृत्याभिनयक्रियाच्युतं
विलिप्यते मौलिभिरम्बरौकसां ॥
ध्रुवं चिताभस्मरजो विशुद्धये ।
तथा हि नृत्याभिनयक्रियाच्युतं
विलिप्यते मौलिभिरम्बरौकसां ॥
अन्वयः
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चिताभस्मरजः तत् अङ्गसंसर्गम् अवाप्य ध्रुवम् विशुद्धये कल्पते । हि तथा (एव) नृत्य अभिनय क्रिया च्युतम् (तत् रजः) अम्बरौकसाम् मौलिभिः विलिप्यते ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
तदिति । शिवस्याङ्गम् तस्य संसर्गमवाप्यासाद्य चिताभस्मैव रजो विशुद्धये कल्पते । अलं पर्याप्नोतीत्यर्थः । अलमर्थयोगात् `नमः- स्वस्तिस्वाहे-` त्यादिना चतुर्थी । ध्रुवं शोधकत्वम् । प्रमाणसिद्धमित्यर्थः । प्रमाणमेवाह--तथाहि । प्रसिद्धमेवेत्यर्थः । नृत्ये ताण्डवे योऽभिनयोऽर्थव्यञ्जकचेष्टाविशेषः स एव क्रिया तया निमित्तेन च्युतं पतितम् । चिताभस्मरज इति शेषः । अम्बरौकसां देवानां मौलिभिर्विलिप्यते ध्रियते । अशुद्धं चेत्कथमिन्द्रादिभिर्ध्रियेतेत्यर्थापत्तिरनुमानं वा प्रमाणमित्यर्थः
Summary
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The dust of funeral pyre ashes, upon coming into contact with his body, certainly becomes fit for purification. Indeed, when it falls during the performance of his cosmic dance, it is smeared on their crowns by the denizens of heaven.
सारांश
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शिव के शरीर के स्पर्श से चिता की भस्म भी परम पवित्र हो जाती है, तभी तो उनके नृत्य के समय अंगों से गिरी धूल को देवता अपने मस्तक पर धारण करते हैं।
पदच्छेदः
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| तदङ्गसंसर्गम् | तद्–अङ्ग–संसर्ग (२.१) | contact with his body |
| अवाप्य | अवाप्य (अव√आप्+ल्यप्) | having obtained |
| कल्पते | कल्पते (√कॢप् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | becomes fit |
| ध्रुवम् | ध्रुवम् | certainly |
| चिताभस्मरजः | चिता–भस्मन्–रजस् (१.१) | the dust of funeral pyre ashes |
| विशुद्धये | विशुद्धि (४.१) | for purification |
| तथा | तथा | so |
| हि | हि | indeed |
| नृत्याभिनयक्रियाच्युतम् | नृत्य–अभिनय–क्रिया–च्युत (१.१) | fallen during the performance of his dance |
| विलिप्यते | विलिप्यते (वि√लिप् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is smeared |
| मौलिभिः | मौलि (३.३) | by the crowns |
| अम्बरौकसाम् | अम्बर–ओकस् (६.३) | of the denizens of heaven |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | द | ङ्ग | सं | स | र्ग | म | वा | प्य | क | ल्प | ते |
| ध्रु | वं | चि | ता | भ | स्म | र | जो | वि | शु | द्ध | ये |
| त | था | हि | नृ | त्या | भि | न | य | क्रि | या | च्यु | तं |
| वि | लि | प्य | ते | मौ | लि | भि | र | म्ब | रौ | क | सां |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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