विपत्प्रतीकारपरेण मङ्गलं
निषेव्यते भूतिसमुत्सुकेन वा ।
जगच्छरण्यस्य निराशिषः सतः
किमेभिराशोपहतात्मवृत्तिभिः ॥
विपत्प्रतीकारपरेण मङ्गलं
निषेव्यते भूतिसमुत्सुकेन वा ।
जगच्छरण्यस्य निराशिषः सतः
किमेभिराशोपहतात्मवृत्तिभिः ॥
निषेव्यते भूतिसमुत्सुकेन वा ।
जगच्छरण्यस्य निराशिषः सतः
किमेभिराशोपहतात्मवृत्तिभिः ॥
अन्वयः
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मङ्गलम् विपत्प्रतीकारपरेण वा भूतिसमुत्सुकेन निषेव्यते । जगत्शरण्यस्य निराशिषः सतः (शिवस्य) आशोपहतात्मवृत्तिभिः एभिः किम् (प्रयोजनम्)?
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
विपदिति । विपत्प्रतीकारपरेण । अनर्थपरिहारार्थिनेत्यर्थः । `उपसर्गस्य घञ्यमनुष्ये बहुलम्` (अष्टाध्यायी ६.३.१२२ ) इति दीर्घः । भूतिसमुत्सुकेनैश्वर्यकामेन वा मङ्गलं गन्धमाल्यादिकं निषेव्यते । शरणे रक्षणे साधुः शरण्यः । `तत्र साधुः` (अष्टाध्यायी ४.४.९८ ) इति यत्प्रत्ययः । `शरणं गृहरक्षित्रोः` इत्यमरः (अमरकोशः ३.३.५९ ) । जगतः शरण्यस्तस्य जगच्छरण्यस्य निराशिषो निरभिलाषस्य सतः शिवस्य । `आशीरिरगदंष्टायां विप्रवाक्याभिलाषयोः` इति शाश्वतः । आशया तृष्णयोपहतादूषितात्मवृत्तिरन्तःकरणवृत्तिर्येषां तैरेभिर्मङ्गलैः किम् । वृथेत्यर्थः पूर्वमङ्लमित्येकवचनस्य जात्यभिप्रायत्वादेभिरिति बहुवचनेन परामर्शो न विरुध्यते । इष्टावाप्त्यनिष्टपरिहारार्थिनो हि मङ्गलाचारनिर्बन्धः । तदुभयासंसृष्टस्य तु यथाकथंचिदास्ताम् । को दोष इत्यर्थः । एतेन `अमङ्गलाभ्यासरतिम्` । (५/६५) इत्युक्तं प्रत्युक्तम्
Summary
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Auspicious things are sought by one who is intent on averting calamity or by one who is eager for prosperity. For one who is the refuge of the world and is free from desires, what is the use of these things, which corrupt the soul's disposition with hope?
सारांश
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जो लोग विपत्ति से डरते हैं या सुख चाहते हैं, वे ही मांगलिक वस्तुओं का संचय करते हैं। जो स्वयं जगत के रक्षक और निष्काम हैं, उन्हें इन आडंबरों की क्या आवश्यकता?
पदच्छेदः
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| विपत्प्रतीकारपरेण | विपद्–प्रतीकार–पर (३.१) | by one intent on averting calamity |
| मङ्गलम् | मङ्गल (१.१) | an auspicious thing |
| निषेव्यते | निषेव्यते (नि√सेव् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is resorted to |
| भूतिसमुत्सुकेन | भूति–समुत्सुक (३.१) | by one eager for prosperity |
| वा | वा | or |
| जगच्छरण्यस्य | जगत्–शरण्य (६.१) | of the one who is the refuge of the world |
| निराशिषः | निराशीस् (६.१) | of one who is free from desires |
| सतः | सत् (√अस्+शतृ, ६.१) | of the one being |
| किम् | किम् | what (use) |
| एभिः | इदम् (३.३) | by these |
| आशोपहतात्मवृत्तिभिः | आशा–उपहत–आत्मन्–वृत्ति (३.३) | by things whose nature is corrupted by hope |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | प | त्प्र | ती | का | र | प | रे | ण | म | ङ्ग | लं |
| नि | षे | व्य | ते | भू | ति | स | मु | त्सु | के | न | वा |
| ज | ग | च्छ | र | ण्य | स्य | नि | रा | शि | षः | स | तः |
| कि | मे | भि | रा | शो | प | ह | ता | त्म | वृ | त्ति | भिः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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