अगूढसद्भावमितीङ्गितज्ञया
निवेदितो नैष्ठिकसुन्दरस्तया ।
अयीदमेवं परिहास इत्युमा-
मपृच्छदव्यञ्जितहर्षलक्षणः ॥
अगूढसद्भावमितीङ्गितज्ञया
निवेदितो नैष्ठिकसुन्दरस्तया ।
अयीदमेवं परिहास इत्युमा-
मपृच्छदव्यञ्जितहर्षलक्षणः ॥
निवेदितो नैष्ठिकसुन्दरस्तया ।
अयीदमेवं परिहास इत्युमा-
मपृच्छदव्यञ्जितहर्षलक्षणः ॥
अन्वयः
AI
इति इङ्गित-ज्ञया तया अगूढ-सद्भावम् निवेदितः नैष्ठिक-सुन्दरः अव्यञ्जित-हर्ष-लक्षणः (सन्) "अयि, इदम् एवम्? परिहासः?" इति उमाम् अपृच्छत् ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
अगूढेति । इङ्गितज्ञया पार्वतीहृदयाभिज्ञया । `इङ्गितं हृद्गतो भावः` इति सज्जनः । तया गौरीसख्येत्येवमगूढसद्भावं प्रकाशितसदभिप्रायं यथा तथा निवेदितो ज्ञापितो निष्ठा मरणमवधिर्यस्य स नैष्ठिको यावज्जीवब्रह्मचारी सुन्दरो विलासी । नैष्ठिकश्चासौ सुन्दरश्चेति तथोक्तः । द्वयोरन्यतरस्य विशेषणत्वविवक्षायां विशेषणसमासः । किंतु नैषठिकत्वविशेषणेन कामित्वविरोधः । अथवा देवस्यालौकिकमहिमत्वादुभयं तात्त्विकमिति न विरोधः । अव्यञ्जितं हर्षलक्षणं मुखरागादि हर्षलिङ्गं यस्य तथाभूतः सन् । अयि गौरि ! अयीति कोमलामन्त्रणे । इदं त्वत्सखीभाषितमेवम् । सत्यं किमित्यर्थः । परिहासः केलिर्वा । `द्रवकेलिपरीहासाः` इत्यमरः (अमरकोशः १.७.३४ ) । इत्येवमुमामपृच्छत्पृष्टवान्
Summary
AI
Thus informed of her undisguised true feelings by her friend who understood gestures, the handsome celibate, concealing any sign of joy, asked Uma, "O lady, is this so? Is it a joke?"
सारांश
AI
पार्वती के मन के भावों को जानने वाली सखी द्वारा सत्य बताए जाने पर, ब्रह्मचारी ने अपने हर्ष को छिपाते हुए पार्वती से पूछा कि क्या यह वास्तव में सत्य है या मात्र परिहास है।
पदच्छेदः
AI
| अगूढसद्भावम् | अ–गूढ–सद्भाव (२.१) | with undisguised true feelings |
| इति | इति | Thus |
| इङ्गितज्ञया | इङ्गित–ज्ञ (√ज्ञा+क, ३.१) | by her who understood gestures |
| निवेदितः | निवेदित (नि√विद्+णिच्+क्त, १.१) | informed |
| नैष्ठिकसुन्दरः | नैष्ठिक–सुन्दर (१.१) | the handsome celibate |
| तया | तद् (३.१) | by her |
| अयि | अयि | O lady |
| इदम् | इदम् (१.१) | this |
| एवम् | एवम् | is so |
| परिहासः | परिहास (१.१) | Is it a joke |
| इति | इति | thus |
| उमाम् | उमा (२.१) | Uma |
| अपृच्छत् | अपृच्छत् (√प्रछ् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | he asked |
| अव्यञ्जितहर्षलक्षणः | अ–व्यञ्जित–हर्ष–लक्षण (१.१) | concealing any sign of joy |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | गू | ढ | स | द्भा | व | मि | ती | ङ्गि | त | ज्ञ | या |
| नि | वे | दि | तो | नै | ष्ठि | क | सु | न्द | र | स्त | या |
| अ | यी | द | मे | वं | प | रि | हा | स | इ | त्यु | मा |
| म | पृ | च्छ | द | व्य | ञ्जि | त | ह | र्ष | ल | क्ष | णः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.