द्रुमेषु सख्या कृतजन्मसु स्वयं
फलं तपःसाक्षिषु दृष्टमेष्वपि ।
न च प्ररोहाभिमुखोऽपि दृश्यते
मनोरथोऽस्याः शशिमौलिसंश्रयः ॥
द्रुमेषु सख्या कृतजन्मसु स्वयं
फलं तपःसाक्षिषु दृष्टमेष्वपि ।
न च प्ररोहाभिमुखोऽपि दृश्यते
मनोरथोऽस्याः शशिमौलिसंश्रयः ॥
फलं तपःसाक्षिषु दृष्टमेष्वपि ।
न च प्ररोहाभिमुखोऽपि दृश्यते
मनोरथोऽस्याः शशिमौलिसंश्रयः ॥
अन्वयः
AI
सख्या स्वयम् कृत-जन्मसु तपः-साक्षिषु एषु द्रुमेषु अपि फलम् दृष्टम् । च अस्याः शशि-मौलि-संश्रयः मनोरथः प्ररोह-अभिमुखः अपि न दृश्यते ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
द्रुमेष्विति । सख्या पार्वत्या स्वयं कृतं जन्म येषां तेषु । स्वयं रोपितेष्वित्यर्थः । तपसः साक्षिषु साक्षाद्रष्टृष्वेषु द्रुमेष्वपि फलं दृष्टम् लब्धम् । जनितमित्यर्थः । अस्याः पार्वत्याः शशिमौलिसंश्रयश्चन्द्रशेखरविषयो मनोरथस्तु प्ररोहाभिमुखोऽङकुरोन्मुखोऽपि न दृश्यते । `प्ररोहस्त्वङ्कुरोङ्कुरः` इति वैजयन्ती । स्वयं रोपितवृक्षफलकालेऽप्यस्या मनोरथस्य नाङ्कुरोदयोऽप्यस्ति । फलाशा तु दूरापास्तेत्यर्थः
Summary
AI
Even on these trees, which were planted by my friend herself and are witnesses to her penance, fruit has been seen. But her desire, which is fixed on the moon-crested one (Shiva), is not seen to be even on the verge of sprouting.
सारांश
AI
उनके द्वारा लगाए गए वृक्षों में तो फल आ गए, जो उनके तप के साक्षी हैं, किंतु शिव को पाने की उनकी मनोकामना अभी भी पूरी होती नहीं दिख रही।
पदच्छेदः
AI
| द्रुमेषु | द्रुम (७.३) | on the trees |
| सख्या | सखि (३.१) | by my friend |
| कृतजन्मसु | कृत (√कृ+क्त)–जन्मन् (७.३) | which were planted |
| स्वयम् | स्वयम् | herself |
| फलम् | फल (१.१) | fruit |
| तपःसाक्षिषु | तपस्–साक्षिन् (७.३) | which are witnesses to her penance |
| दृष्टम् | दृष्ट (√दृश्+क्त, १.१) | has been seen |
| एषु | एतद् (७.३) | on these |
| अपि | अपि | even |
| न | न | not |
| च | च | But |
| प्ररोहाभिमुखः | प्ररोह–अभिमुख (१.१) | on the verge of sprouting |
| अपि | अपि | even |
| दृश्यते | दृश्यते (√दृश् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is seen |
| मनोरथः | मनोरथ (१.१) | the desire |
| अस्याः | इदम् (६.१) | of hers |
| शशिमौलिसंश्रयः | शशि–मौलि–संश्रय (सम्√श्रि+अच्, १.१) | which is fixed on the moon-crested one (Shiva) |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| द्रु | मे | षु | स | ख्या | कृ | त | ज | न्म | सु | स्व | यं |
| फ | लं | त | पः | सा | क्षि | षु | दृ | ष्ट | मे | ष्व | पि |
| न | च | प्र | रो | हा | भि | मु | खो | ऽपि | दृ | श्य | ते |
| म | नो | र | थो | ऽस्याः | श | शि | मौ | लि | सं | श्र | यः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.