यदा बुधैः सर्वगतस्त्वमुच्यसे
न वेत्सि भावस्थमिमं जनं कथम् ।
इति स्वहस्ताल्लिखितश्च मुग्धया
रहस्युपालभ्यत चन्द्रशेखरः ॥
यदा बुधैः सर्वगतस्त्वमुच्यसे
न वेत्सि भावस्थमिमं जनं कथम् ।
इति स्वहस्ताल्लिखितश्च मुग्धया
रहस्युपालभ्यत चन्द्रशेखरः ॥
न वेत्सि भावस्थमिमं जनं कथम् ।
इति स्वहस्ताल्लिखितश्च मुग्धया
रहस्युपालभ्यत चन्द्रशेखरः ॥
अन्वयः
AI
"यदा बुधैः त्वम् सर्व-गतः उच्यसे, (तदा) भाव-स्थम् इमम् जनम् कथम् न वेत्सि?" इति मुग्धया स्व-हस्तात् लिखितः चन्द्र-शेखरः च रहसि उपालभ्यत ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
यदेति । यदा यत इत्यर्थः । यदेति हेतावित्युक्त्वा गणव्याख्यानेऽस्योदाहृतत्वात् । त्वं बुधैर्मनीषिभिः सर्वगतः सर्वव्यापीत्युच्यसे । तत इत्यध्याहारः । भावे रत्याख्ये तिष्ठतीति भावस्थम् । त्वय्यनुरागिणमित्यर्थः । इमं जनम् । इममित्यात्मनिर्देशः । कथं न वेत्सि न जानासीति मुग्धया मूढया अकिंचित्करश्चित्रगतोपालम्भ इत्यजानानयेत्यर्थः । तया स्वहस्तेनोल्लिखितश्चित्रे लिखितश्चन्द्रशेखरो रहस्येकान्ते । सखीमात्रसमक्षमित्यर्थः । उपालभ्यत साधिक्षेपमुक्तश्च । उक्तसमुच्चयार्थश्चकारः । यद्यपि रहसीत्युक्तं तथापि सखीसमक्षकरणाल्लज्जत्यगो व्यज्यत एव
Summary
AI
"When you are said by the wise to be all-pervading, why do you not know this person (me) who is in a state of love?" Thus, Chandrashekhara (Shiva), drawn by her own hand, was also reproached in private by the innocent girl.
सारांश
AI
'विद्वान आपको सर्वव्यापी कहते हैं, फिर आप मेरे मन की व्यथा क्यों नहीं जानते?'—ऐसा कहकर वे एकांत में स्वयं द्वारा बनाए गए शिव के चित्र को उलाहना देती थीं।
पदच्छेदः
AI
| यदा | यदा | When |
| बुधैः | बुध (३.३) | by the wise |
| सर्वगतः | सर्व–गत (√गम्+क्त, १.१) | all-pervading |
| त्वम् | युष्मद् (१.१) | you |
| उच्यसे | उच्यसे (√वच् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) म.पु. एक.) | are said to be |
| न | न | not |
| वेत्सि | वेत्सि (√विद् कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | do you know |
| भावस्थम् | भाव–स्थ (√स्था+क, २.१) | who is in a state of love |
| इमम् | इदम् (२.१) | this |
| जनम् | जन (२.१) | person (me) |
| कथम् | कथम् | why |
| इति | इति | Thus |
| स्वहस्तात् | स्व–हस्त (५.१) | by her own hand |
| लिखितः | लिखित (√लिख्+क्त, १.१) | drawn |
| च | च | also |
| मुग्धया | मुग्ध (३.१) | by the innocent girl |
| रहसि | रहस् (७.१) | in private |
| उपालभ्यत | उपालभ्यत (उप+आ√लभ् भावकर्मणोः लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was reproached |
| चन्द्रशेखरः | चन्द्र–शेखर (१.१) | Chandrashekhara (Shiva) |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | दा | बु | धैः | स | र्व | ग | त | स्त्व | मु | च्य | से |
| न | वे | त्सि | भा | व | स्थ | मि | मं | ज | नं | क | थम् |
| इ | ति | स्व | ह | स्ता | ल्लि | खि | त | श्च | मु | ग्ध | या |
| र | ह | स्यु | पा | ल | भ्य | त | च | न्द्र | शे | ख | रः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.