मुनिव्रतैस्त्वामतिमात्रकर्शितां
दिवाकराप्लुष्टविभूषणास्पदाम् ।
शशाङ्कलेखामिव पश्यतो दिवा
सचेतसः कस्य मनो न दूयते ॥
मुनिव्रतैस्त्वामतिमात्रकर्शितां
दिवाकराप्लुष्टविभूषणास्पदाम् ।
शशाङ्कलेखामिव पश्यतो दिवा
सचेतसः कस्य मनो न दूयते ॥
दिवाकराप्लुष्टविभूषणास्पदाम् ।
शशाङ्कलेखामिव पश्यतो दिवा
सचेतसः कस्य मनो न दूयते ॥
अन्वयः
AI
मुनि-व्रतैः अति-मात्र-कर्शिताम्, दिवाकर-आप्लुष्ट-विभूषण-आस्पदाम्, दिवा शशाङ्क-लेखाम् इव (स्थिताम्) त्वाम् पश्यतः स-चेतसः कस्य मनः न दूयते?
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
मुनिव्रतैरिति । मुनिव्रतैश्चान्द्रायणादिभिरतिमात्रमत्यन्तं कर्शितां कृशीकृतां दिवाकरेण सूर्येणाप्लुष्टानि दग्धानि वातातपसंस्पर्शात्मृदुत्वाच्च श्यामीकृतानि विभूषणस्थानानि यस्यास्तां तथोक्ताम् । अत एव दिवाहनि शशाङ्करेखामिव स्थितां त्वां पश्यतः सचेतसो जीवतः कस्य पुंसो मनो न दूयते न परितप्यते । अपि तु सर्वस्यैवेत्यर्थः
Summary
AI
"Whose sentient mind would not be pained on seeing you, excessively emaciated by ascetic vows, the places for your ornaments scorched by the sun, appearing like the pale crescent moon seen during the day?"
सारांश
AI
तपस्या के कारण अत्यंत दुर्बल और धूप से झुलसी हुई तुम्हें देखकर, दिन में दिखने वाली चंद्रमा की धुंधली कला की भाँति तुम्हारी दशा पर किसका मन नहीं दुखेगा?
पदच्छेदः
AI
| मुनिव्रतैः | मुनि–व्रत (३.३) | by the vows of sages |
| त्वाम् | युष्मद् (२.१) | you |
| अतिमात्रकर्शिताम् | अतिमात्र–कर्शित (√कृश्+णिच्+क्त, २.१) | who are excessively emaciated |
| दिवाकराप्लुष्टविभूषणास्पदाम् | दिवाकर–आप्लुष्ट (आ√प्लुष्+क्त)–विभूषण–आस्पद (२.१) | whose places for ornaments are scorched by the sun |
| शशाङ्कलेखाम् | शशाङ्क–लेखा (२.१) | the crescent of the moon |
| इव | इव | like |
| पश्यतः | पश्यत् (√दृश्+शतृ, ६.१) | of one who sees |
| दिवा | दिवा | during the day |
| सचेतसः | स–चेतस् (६.१) | of a sentient being |
| कस्य | किम् (६.१) | whose |
| मनः | मनस् (१.१) | mind |
| न | न | not |
| दूयते | दूयते (√दू भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is pained |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मु | नि | व्र | तै | स्त्वा | म | ति | मा | त्र | क | र्शि | तां |
| दि | वा | क | रा | प्लु | ष्ट | वि | भू | ष | णा | स्प | दाम् |
| श | शा | ङ्क | ले | खा | मि | व | प | श्य | तो | दि | वा |
| स | चे | त | सः | क | स्य | म | नो | न | दू | य | ते |
| ज | त | ज | र | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.